यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ श्रीमदभगवद्गीता (३:१३)
अर्थ : यज्ञसे बचे हुए अन्नको ग्रहण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपने शरीरपोषण के लिए अन्न पकाते हैं, वे तो पापको ही खाते हैं॥
भावार्थ : वैदिक संस्कृतिमें यज्ञ कर भोजन देवताओंको समर्पित कर, उसके पश्चात ही ग्रहण किया जाता था | हमारे यहां कहा जाता था कि हम जीनेके लिए भोजन ग्रहण करते हैं, परंतु आज खानेके लिए जीने लगे हैं अर्थात मात्र आज हम अपने जिह्वाका आनंद पानेके लिए भोजन करते हैं | पुरुष संध्या और नित्य यज्ञकर्म कर ही प्रसाद ग्रहण करते थे | भारतीय संस्कृतिमें रसोईघर अन्नपूर्णा कक्ष समान होता है, स्त्रियां रजस्वलाके समय न अंदर जाती थीं और न ही भोजन बनाती थीं अन्य दिनोंमें भी बिना स्नान किए रसोईघरमें नहीं जाती थीं | जिन घरोंमें भोजन किसी सेवकद्वारा बनाया जाता था वे भी पूरी शुचिताका पालन करते थे | देवताको नैवेद्य दिखाकर ही भोजन ग्रहण किया जाता था | इसलिए होटल संस्कृति तो हमारे यहां थी ही नहीं | भोजन बनाना और ग्रहण करना दोनों ही एक यज्ञकर्म था और अन्नको तो पूर्ण ब्रह्म माना गया है | प्रचलित देसी कहावत है ‘जैसा खाये अन्न वैसा रहे मन’ अतः अन्नकी शुचितापर विशेष ध्यान दिया जाता था | अन्नको उत्पन्न करते समयसे लेकर उसे भोजनके रूपमें ग्रहण करने तक अन्नके ऊपर अनेक संस्कार किए जाते थे तभी तन और मन दोनों ही पवित्र रहता था और यह साधनाके लिए पोषक तो था ही शरीर और मन दोनों ही स्वस्थ रहता था | मृत्युके पश्चात, बच्चेके जन्मके पश्चात भी कुछ दिन अन्न पकाने और खानेके ऊपर विशेष नियमका पालन किया जाता था; परंतु आज पैशाचिक पाश्चात्य संस्कृतिके अंधा अनुकरणने हमें अन्नको मात्र जिह्वाके स्वाद या शरीरके पोषण हेतु एक माध्यम बनाया गया है और सारे संस्कारोंका पतन हो गया है अतः दूषित अन्न ग्रहण करनेके कारण अनेक प्रकारके रोगसे हम ग्रसित हो जाते हैं | कलियुगमें भोजन बनाते समय और ग्रहण करते समय नामजप अवश्य करना चाहिए |
-तनुजा ठाकुर
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