१. द्वापरयुगके महाभारतकी आदर्श शिक्षा
दुर्योधन, कौरव कुलके विनाशका कारण बनेगा, ऋषिमुनियोंको यह ज्ञात था; अतः उसके जन्मके पूर्वही उसका त्याग किया जाए, ऐसा धृतराष्ट्रको बताते हुए ऋषि-मुनि कहते हैं,
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥ – महाभारत, पर्व १, अध्याय १०७, श्लोक ३२
अर्थ : सम्पूर्ण कुलके कल्याण हेतु अगर एक पुत्रका त्याग करना पडे तो उसे करें ! एक गांवको बचानेके लिए एक कुलका त्याग करना पडे, तो अवश्य करें ! राष्ट्रके लिए आवश्यकतानुसार गांवका भी त्याग करें तथा आत्मकल्याणके लिए पृथ्वीका भी (स्वयंके प्राणोंका भी) त्याग करना पडे तो अवश्य करें !
२. कलियुगमें भारतकी वर्तमान स्थिति दर्शानेवाला नवीन संस्कृत वचन !
त्यजेत् कुलं ह्येकस्यार्थे कुलस्यार्थे ग्रामं त्यजेत् ।
जनपदं ग्रामस्यार्थे स्वार्थाय पृथिवीं त्यजेत् ॥
अर्थ : अपने स्वयंके कल्याणके लिए कुलका त्याग करना पडे तो करें ! अपने स्वयंके कुलके लिए गांवका पतन होनेवाला हो तो उसे होने दें ! स्वयंके गांवके लिए (प्रान्तके लिए) राष्ट्रहितकी बलि देनी पडे तो दें तथा स्वयंके स्वार्थके लिए सम्पूर्ण पृथ्वीका विनाश करना पडे, तो अवश्य करें ! – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले (३१.३.२०१५)
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