दिसम्बर २९, २०१८
उत्तराखण्ड उच्च न्यायालयके आदेशानुसार योगगुरु बाबा रामदेवकी ‘दिव्य फार्मेसी’को २.०४ कोटि रुपये समुदायोंके साथ साझा करने होंगें ! उच्च न्यायालयने ‘दिव्य फार्मेसी’द्वारा ‘उत्तराखण्ड जैव विविधता समिति’के विरुद्ध प्रविष्ट याचिका अस्वीकृत करते हुए कम्पनीको होने वाले न्यायोचित लाभका कुछ अंश साझा करनेका समितिका आदेश स्थिर रखा, जो कि जैव विविधता अधिनियम, २००२ में प्रावधानोंके अनुरूप है ।
न्यायालयने इस प्रकारके अपने पूर्वादेशमें ‘फार्मेसी’को अपने लाभको कच्चे मालका उत्पादन करने वाले किसानोंके साथ साझा करनेका निर्देश दिया । इससे पूर्व समितिने ‘दिव्य फार्मेसी’को वैधानिक प्रावधानोंके अनुसार अपने ४.२१ अरब रुपयेके लाभमेंसे २.०४ कोटि रुपये किसानों और स्थानीय समुदायोंके साथ साझा करनेके निर्देश दिए थे । ‘फार्मेसी’ने यह कहते हुए इस आदेशको चुनौती दी थी कि समितिके पास ऐसे निर्देश देनेके न तो अधिकार हैं और न ही यह प्रकरण उसके अधिकार क्षेत्रमें है ।
न्यायमूर्ति धूलियाकी पीठने कहा कि यह एक स्वीकार्य तथ्य है कि जैव संसाधन आयुर्वेदिक उत्पादोंके उत्पादनके लिए मुख्य घटक और कच्चा माल है और जून १९९२ में रियोमें हुए ‘युनाइटेड नेशंस कन्वेंशन आन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी’पर भारत हस्ताक्षर कर चुका है ।
न्यायालयने कहा कि इसलिए समितिको ऐसा आदेश देनेका अधिकार है, क्योंकि जैविक संसाधन न केवल राष्ट्रीय सम्पत्ति है, वरन ये उन्हें उत्पादित करने वाले समुदायोंकी भी सम्पत्ति है । इन परम्पराओंको जीवित रखने और अगली पीढियोंमें ज्ञानको पहुंचानेके लिए उच्च हिमालयी क्षेत्रोंमें रहने वाले समुदाय ऐसे लाभके लिए अधिकृत हैं, ताकि ये जैविक संसाधन बने रहें ।
“पतंजलि ऐसे ही स्वदेशी ढंगसे कार्यकर लोगोंको कार्य प्रदान कर रहा है और देशके लिए ही परियोजनाएं चला रहा है तो ऐसेमें किसी भी स्वदेशी औद्योगिक संस्थानको ऐसे लाभ वितरणके लिए बोलना उसकी हत्याके समान है ! विदेशी उद्योग भारतसे सहस्रों कोट्यावधि रुपये लूटकर ले जाते हैं और वे एक पैसा भी भारतके लिए व्यय नहीं करते हैं तो ऐसेमें न्यायालयद्वारा अपना सम्पूर्ण लाभ भारतके लिए ही व्यय करने वाले स्वदेशी उद्योगको, २से ३ कोटि लोगोंमें साझा करना अवश्य सन्देहास्पद है !” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : अमर उजाला
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