जुलाई ८, २०१९
उच्चतम न्यायालयने सोमवार, ८ जुलाईको मुसलमान महिलाओंके मस्जिद प्रवेश और उन्हें पर्दा प्रथासे मुक्ति दिलानेकी याचिकाएं नकार दीं ! उच्चतम न्यायालयने कारण यह बताया कि याचिकाकर्ता स्वयं मुसलमान नहीं है, इसलिए केरल उच्च न्यायालयके निर्णयके विरुद्ध प्रविष्ट इस याचिकापर सुनवाईका कोई औचित्य नहीं है । यह निर्णय सबरीमालामें उसके निर्णयके विपरित है । तब याचिकाकर्ताओंमेंसे केरलके निवासी नहीं होनेके पश्चात और न ही मंदिरकी परम्पराओंकी जानकार होनेके पश्चात भी उनकी याचिका सुनी थी ।
याचिकाको नकारते हुए सीजेआईने कहा, “पहले किसी मुसलमान महिलाको आने दो, तदोपरान्त हम (इसपर) सोचेंगें ।”
यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि जहां उच्चतम न्यायलयने प्रकरणके विषयसे (मस्जिद और मुसलमान महिलाओं) याचिकाकर्ताओंके सम्बन्धको ही न मानते हुए याचिकाको निरस्त किया, वहीं उच्च न्यायालयने इसलिए किया था कि याचिकाकर्ता हिन्दू महासभा उसे यह आश्वस्त नहीं कर पाई थी कि महिलाओंको मस्जिदोंमें प्रवेशसे रोका जा रहा है । इसके अतिरिक्त ‘सस्ती लोकप्रियता’के लिए याचिका प्रविष्ट करनेकी टिप्पणी भी उच्च न्यायालयने याचिकाकर्ताओंपर की थी ।
“यह है भारतका छद्म व द्विपक्षीय न्यायतन्त्र ! अब इससे स्पष्ट है कि क्यों न्यायतन्त्र पंगु हो चला है और क्यों महत्वपूर्ण निर्णय नहीं हो पा रहे हैं । अस्वच्छ व कीचडमें सने इस न्यायतन्त्रको अब केवल हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनापर ही पवित्र किया जा सकता है”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : ऑप इण्डिया
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