मार्च ३, २०१९
घंटों मोर्टार छोडे जानेकी ध्वनि, निरन्तर हो रही भारी गोलीबारी, आकाशमें उठता धुएंका गुबार और प्रत्येक समय मृत्युकी सूचना, जम्मू-कश्मीर सीमा और नियन्त्रण रेखाके पास रहनेवालों लोगोंके दिनका आरम्भ भी इन्हीं चीजोंसे होता है और रात भी मृत्युके भयमें चली जाती है ! सीमापर पाकिस्तानकी ओरसे संघर्ष विरामका उल्लंघन जारी है; परन्तु पुलवामा आक्रमणके पश्चात स्थिति और अधिक बिगडी हैं । गत एक सप्ताहसे गोलीबारी की घटनाएं बढी हैं ।
सीमा पारसे प्रतिदिन ही असमय भारतीय गांवों और चौकियोंपर गोलीबारी हो रही है । पाकिस्तानके इस कृत्यसे स्थानीय लोगोंका जीना कठिन हो गया है । मृत्यु प्रतिदिन गांववालोंके सिरपर नाचती है । जीवन बचानेके लिए लोग अपना घर और मवेशियोंको निराश्रित छोडकर सुरक्षित स्थानोंपर शरण लेनेको विवश हो गए हैं । युद्ध जैसी स्थितिके मध्य सीमापर रहनेवाले लोग जीवन जी नहीं रहे, वरन काट रहे हैं । सीमाके पास पुंछके सालोत्री गांवकी रहनेवाली रकमतकी (५०) ही कहानी सुने तो भारी गोलीबारीके मध्य रकमत टिन छप्परवाले मिट्टीके घरमें अपने पांच वर्षके पोतेको सुलानेका प्रयास कर रही थीं, जो सम्भवतः गोलीकी आवाजसे सहमकर उठ गया था । बंदूकें अपेक्षाकृत शान्त होने या गोलीबारी हल्की होनेपर रकमत पोतेको सुलाकर दूसरे कक्षमें विश्राम करने जाती ही हैं कि पुनः गोली चलनेकी ध्वनि आने लगी । पाकिस्तानकी ओरसे दागा गया गोला सीधा रकमतके घरपर गिरा, जिसमें तीन लोगोंकी मृत्यु हो गई । मरने वालोंमें रकमतकी बहू और पोता-पोती सम्मिलित थे ।
रकमत कहती हैं, “मैं अल्लाहसे निरन्तर प्रार्थना कर रही थी कि बम और गोलेकी आवाज रुक जाए; परन्तु आवाजें निरन्तर बढ रही थी और पहलेसे अधिक तीव्र हो रही थी । एकाएक एक गोला आ गिरा और एक ही झटकेमें मेरा घर नष्ट हो गया । पाकिस्तानकी ओरसे छोडे गए गोलेमें रकमतकी पुत्रवधू और पोता-पोतीके प्राण चले गए, जबकि उनका २७ वर्षका पुत्र जीवन और मृत्युसे लड रहा है ।
शनिवारको जब शासनके अधिकारी गांवका भ्रमण करने पहुंचे, तो लोगोंके धैर्यका बांध टूट गया । लोगोंने दूसरे स्थानपर स्थानान्तरित करानेके लिए अधिकारियोंके सामने विनती की । इसके पश्चात प्रशासनने कुछ इन लोगोंको दूसरे स्थानपर अस्थायी रूपसे स्थानान्तरित भी करा दिया है ।
रकमतकी पुत्रवधू और पोते-पोतीके शोकमें आए अब-रजाक खाकी कहते हैं कि हमारे नेता युद्धकी बात करते हैं । क्या वो इसका अर्थ भी जानते हैं ? हम दिनभर कडा परिश्रम करते हैं, तब जाकर दो समयके भोजनकी व्यवस्था हो पाती है । हम इस आशासे वोट डालते हैं कि नूतन शासन हमें इस मृत्युके जालसे निकालेगी; परन्तु नहीं होता, कुछ भी नहीं होता ऐसा ! वहीं, युद्धकी स्थितिमें अपने परिवारको खोनेके पश्चात भी रकमत अभी भी कहती हैं कि वो अपना क्षेत्र छोडकर कहीं और नहीं जाना चाहती, मृत्यु आनी हो तो आए !
“युद्ध किसीके लिए भी अच्छा सन्देश नहीं लाता है । न ही रकमतके लिए और न ही उन कश्मीरी पण्डितोंके लिए जिन्हें रातों-रात अपना सब कुछ छोडकर भागना पडा ! और इस युद्धका कारण केवल और केवल धर्मान्धता ही है । रकमतके साथ जो हुआ वह धर्मान्धताका ही परिणाम है; अतः यदि हम कश्मीरकी प्रसन्नता पुनः वापस चाहते हैं तो आतंकवाद व उसके जनकका समूल विनाशकर कश्मीरी पण्डितोंको वहां बसाकर ही यह सम्भव है !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : न्यूज १८
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