जून २०, २०१९
स्वराज्य पत्रिकाने तमिलनाडुमें चल रही ईसाई मिशनरियोंकी मतांतरणकी फैक्ट्री उजागर करते हुए एक ब्यौरा जारी किया है । द्रविड आंदोलन, ‘आर्य-द्रविड विभाजन’ जैसे फर्जी प्रकरणकेद्वारा तमिलनाडुमें हिन्दुत्व/हिन्दू धर्मकी जडोंको दीमककी भांति चाट रहे पादरियोंका कच्चा चिट्ठा ब्यौरेमें है और किसप्रकार ‘सेक्युलरिज्म’के पिछले द्वार और द्रविडवादी पार्टियोंकी सांठ-गांठसे लोकप्रथाओंके साथ खिलवाडकर हिन्दुओंको ईसाई बनानेका खेल चल रहा है, इसपर विस्तारसे बताया गया है ।
‘द्रविड आंदोलन हमारा टाइम बम है हिंदुत्वके विरुध्द’
ब्यौरेके आरम्भमें ही स्वराज्य उद्धृत करती है, तमिलनाडुके प्रख्यात आध्यात्मिक गुरु और शिक्षाविद चित् भावानन्दको । बकौल स्वराज्य, चित भावानंदके सामने एक बार एक मदुरैके ईसाई बिशपने (शेखी बघारते हुए) कहा था कि द्रविड आंदोलन गिरिजाघरोंकी ओरसे लगाया हुआ एक टाइम बम है, हिंदुत्वको नष्ट करनेके लिए । कैसे तमिलनाडुमें एक झूठा इतिहास पढाया जा रहा है, जिसमें द्रविडवादी नस्लभेद और ईसाई योजनाका मिश्रण होता है ।
“हिन्दू धर्म/हिन्दुत्व जैसी कोई चीज नहीं होती; जो बोले होती है, उसे पीट-पीटकर अक्ल ठिकानेपर ले आओ” जैसी साम्प्रदायिक रूपसे भडकाऊ बातें करनेवाला यह पादरी स्वराज्यके अनुसार कोई ऐसा वैसा व्यक्ति नहीं है, वरन द्रविडवादी सत्तामें विशेष पहुंच रखता है । हिंसा भडकानेकी अपीलके अतिरिक्त सत्ताकी दलाली, गठबंधन बनवाना-बिगडवाना भी इसके कार्य हैं । १९६० के दशकमें सरगुनामने कुम्भमें आकर भी हिन्दुओंके मध्य उनके देवताओंको ‘शैतान’ बतानेका दुस्साहस किया था । श्रद्धालुओंके कोपसे उलटे पैर वापिस होना पडा ।
सरगुनामका दावा है कि उसने एक कोटि तमिल हिन्दुओंको ईसाई बनाया है और पांच लाख गिरिजिघर राज्य भरमें खडे किए हैं । ‘स्वराज्य’के अनुसार उसकी ‘ट्रेनिंग’ बिली ग्राहम नामक अमेरिकी पादरीके अन्तर्गत हुई थी, जो डार्विनके जैवीय विकास सिद्धान्तका विरोधी था और यहूदियोंके विरुद्ध नस्लवादी बातें करनेके लिए बदनाम था ।
इस कैथोलिक पादरीके उभारको स्वराज्य सीधे-सीधे द्रमुकसे जोडता है । आरोप है कि यह तमिल हिन्दुओंकी लोक परम्पराओंको पहले ‘सेक्युलर’ बनाता है, और बादमें धीरे-धीरे जब लोग यह भूल जाते हैं कि यह ‘सेक्युलर’ नहीं, हिन्दू परम्पराएं हैं, तो चर्च हिन्दुओंके करके पैसेसे सहायता पानेवाले ईसाई शिक्षा संस्थानोंकेद्वारा उनपर ईसाई बाना लगाकर लोगोंके मतांतरणका खेल आरम्भ कर देता है । इसके अतिरिक्त गास्पर एक तथाकथित ‘विद्वान’ मा. से. विक्टरके लेखनका प्रसार करनेवाला प्रकाशन भी चलाता है, जिसमें तमिलोंको ईसाईयतकी ओर आकर्षित करनेवाले षडयन्त्र किए जाते हैं; उदाहरणके लिए, यह दावा किया जाता है कि एडम (ईसाई मिथकोंके अनुसार परमात्माका बनाया पहला मानव) तमिल बोलता था । ऐसे दावोंको द्रमुक शासन राज्यमें जब भी आता है तो ऊपर से धकेला जाता है ।
ऐसे षडयन्त्रसे पहले भरे गए द्रविड पृथकतावादको हवा दी जाती है और उसके पश्चात उसकी आगसे तमिलोंकी हिंदुत्वसे गर्भनालको जला दिया जाता है; अतः जब द्रमुक बिशपोंका समर्थन करती है, तो यह केवल तात्कालिक वोट-बैंककी राजनीति नहीं होती । यह हिन्दुओं और हिंदुत्वके विरुद्घ नस्लवाद और ईसाईयतका ‘कॉकटेल’ होता है ।
मोहन सी लजारस ईसाई प्रचारक है, जिसका दावा है कि ईसा मसीहने उसके हृदय रोगकी चिकित्साकर उसे ईसाईयतके प्रचारका आदेश दिया था । धार्मिक, श्रद्धालु तमिल हिन्दू परिवारमें पैदा हुए मोहन लजारसका जन्मका नाम मुरुगन था । आज लजारसको कट्टर और रूढिवादी ईसाईके रूपमें देखा जाता है !! उसके मंचपर स्टालिन जैसे द्रमुक नेता देखे जा सकते हैं और उसने अपना मुख्य कार्यालय एक रणनीतिके अनुसार प्राचीन हिन्दू तीर्थस्थल तिरुचेंडूरके बगलमें नालूमावाडीमें बनाया है । उसका एक विवादस्पद वीडियो सामने आया था, जहां उसने तमिलनाडुमें मंदिरोंकी बडी संख्याको इंगित करते हुए राज्यको ‘शैतान’का गढ बताया था ।
तमिलनाडु कई कारणोंसे हिंदुत्वका वह गढ है, जिसकी हिन्दुओंको सबसे अधिक रक्षा करनेकी आवश्यकता है, और हिन्दू-विरोधियोंकी सबसे गिद्ध-दृष्टि भी इसपर है । पहला कारण तो यह कि हिन्दू आध्यात्मिक परम्पराएं अपने विशुद्ध, मूल रूपमें दक्षिण भारतमें, विशेषतः तमिलनाडुमें सर्वाधिक सुरक्षित हैं । उत्तर भारत और उत्तरी दक्षिण भारतमें इस्लामी आक्रमण और इस्लामके राजनीतिक रूपसे थोपे जानेसे कई हिन्दू परम्पराएं (जैसे वाराह मूर्ति, नरसिंह आदिका पूजन) केवल तमिलनाडुमें आज भी जीवंत है ।
गत दिवसोंमें जब काशी विश्वनाथ मंदिरमें २३८ वर्ष पश्चात कुम्भाभिषेकंको पुनर्जीवित करनेका प्रयास हुआ तो यह भान हुआ कि काशीमें सभीको यह विधि विस्मृत हो चुकी थी । तब एक तमिल व्यक्तिने इसकी विधि बताई थी । इसके अतिरिक्त चिदंबरम नटराजा समेत पांचमेंसे चार पंचभूतस्थळं, अरुणाचलम पहाडी सहित कई सारे विशिष्ट मंदिर और आध्यात्मिक महत्वके स्थान भी तमिलनाडुमें हैं ।
राजनीतिक दृष्टिसे भी देखें तो तमिलनाडुका द्रविड आंदोलन कहीं-न-कहीं अन्य दक्षिणी भाषाई समूहों- मलयाली, तेलुगु, कन्नडको भी प्रभावित करता है । जब तमिलनाडुमें हिंदी-विरोधी या द्रविड नस्लवादी आंदोलन जोर पकडता है तो वह इन राज्योंमें प्रतिध्वनित हुए बिना नहीं रहता ।
“अब समझमें आ रहा होगा क्यों द्रुमक नेता हिन्दी भाषाका विरोध कर रहे थे ? ये राजनीतिक दल नहीं वरन षडयन्त्रकारी विद्रोही हैं, इन्हें तमिलनाडुसे उखाडना अत्यावश्यक है; अन्यथा हम एक सांस्कृतिक राज्यको खो देंगें । हिन्दुओ ! समय रहते जागे और एक होकर धर्म रक्षण हेतु सज्ज हों !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : ऑप इण्डिया & स्वराज्य
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