अभिषेक वर्माको बचानेके लिए आलोक वर्मापर ५३० सहस्र डॉलर घूस लेनेका था आरोप !


नवम्बर ३०, २०१८

केन्द्रीय अन्वेषण विभागके (सीबीआईके) आंतरिक विवादको लेकर छुट्टीपर भेजे गए सीबीआई निदेशक आलोक वर्माका कांग्रेसके साथ साठगांठकी पोल खुलनी आरम्भ हो गई है । किस प्रकार उन्होंने कांग्रेसी आर्म्स डीलर अभिषेक वर्माको बचानेके लिए सीबीआई केसको कमजोर किया था, वह भी अब सामने आ गया है । ईमानदारीका ढोल पीटने वाले सीबीआई निदेशक आलोक वर्माके नेतृत्वमें दो वर्ष तक जांचके पश्चात भी सीबीआई आर्म्स डीलर अभिषेक वर्माके विरुद्घ कोई ठोस साक्ष्य न्यायालयके समक्ष प्रस्तुत नहीं कर पाई । इसी कारण विशेष न्यायालयने उसके विरुद्घ प्रविष्ट भ्रष्टाचार प्रकरणको नकार दिया है ।


जर्मनी आर्म्स कंपनी रेनमेटल एयर डिफेंस (आरएडी) भ्रष्टाचार प्रकरणमें विशेष न्यायालयने कांग्रेसी आर्म्स डीलर अभिषेक वर्माके विरुद्घ भ्रष्टाचारके प्रकरणको रद्द कर दिया है । रेनमेटल एयर डिफेंस वही उद्योग है, जिसे प्रतिबन्धित होनेसे बचानेके लिए आलोक वर्मापर सरकारी अधिकारियोंको प्रभावित करनेके लिए ५३० सहस्र डॉलर घूस लेनेका आरोप लगाया गया था ।

आरोप है कि वर्माने सरकारी अधिकारियोंको इस प्रकरणमें प्रभावित कर उसे प्रतिबन्धित होनेसे बचानेमें सहायता की थी । तभी तो आलोक वर्माके दो वर्ष तक सीबीआई निदेशक रहनेके मध्य अभिषेक वर्माके विरुद्घ सीबीआई कोई साक्ष्य नहीं प्रस्तुत कर पाई । आरोप है कि इस प्रकरणको जानबूझ कर दुर्बल किया गया, जिसका परिणाक्ष सबके समक्ष है । सीबीआईके विशेष न्यायालयकी न्यायाधीश अंजू बजाज चंदनाने साक्ष्यके अभावमें अभिषेक वर्माके विरुद्घ भ्रष्टाचारके प्रकरण रद्द कर दिए । अभिषेक वर्माका नाम केवल रेनमेटल आर्म कंपनीसे नहीं जुडा है, बल्कि वृश्चिक पनडुब्बी, अगस्टा वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर रिश्वत घोटाला और नौसेनाके युद्ध कक्ष लीक प्रकरणमें भी मुख्य संदिग्ध रहे हैं ! उल्लेखनीय है कि अभिषेक वर्माके विरुद्घ जांचके मध्य सीबीआईके निदेशक आलोक वर्मा ही थे । आरोप है कि आलोक वर्माने इस अभियोगको दुर्बल किया, ताकि उसके विरुद्घ कोई साक्ष्य न मिले । इस प्रकरणमें स्वयं आलोक वर्मापर भी रिश्वत लेनेका आरोप लगा था । तभी तो जैसे ही न्यायालयने अभिषेक वर्माके विरुद्घ प्रकरण रद्द किया, आलोक वर्माने पत्रकारोंके माध्यमसे यह संदेश दिया था कि न्यायालयने उनके और उनकी पत्नी अंकाके विरुद्घ दोनों प्रकरण रद्द कर दिए । जबकि सत्य यह था कि उनके विरुद्घ कई अन्य प्रकरण लंबित थे ।

आलोक वर्मापर अवैध उद्योगको प्रतिबन्धित सूचीमें जानेसे बचानेके लिए ५३० सहस्र डॉलर घूस लेनेका आरोप लगा था । आलोक वर्माके विरुद्ध घूस प्रकरणका रद्द होना एक प्रकारसे सीबीआईके लिए धक्का है, क्योंकि सीबीआई भारतके साथ डिफेंस डील निर्धारित करने वाले अन्तर्राष्ट्रीय नेटवर्कके साथ वर्माके सम्फन्ध स्थापित करनेमें लगी हुई थी ।

अर्थात स्पष्ट है कि सीबीआई निदेशक रहते आलोक वर्माने पूरी जांच प्रक्रियाको प्रभावित किया । आज यदि राहुल गांधी आलोक वर्माके लिए तडप रहे हैं तो सम्भवतः इसीलिए कि वह सीबीआई मुख्यालयमें सबसे बडे पदपर बैठे कांग्रेसका विशेष साधन थे !

स्रोत : इण्डिया स्पीक्स



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