मार्च २, २०१९
विभाजनके पश्चात आपसमें चारबार युद्धकर चुके भारत और पाकिस्तानके मध्य तनावपूर्ण सम्बन्व कोई नूतन प्रकरण नहीं है । आए दिन सीमा रेखापर पाकिस्तानकी ओरसे सीमारेखाका उल्लंघनकर गोलीबारी करना भी कुछ नूतन नहीं है । अन्तिम बार पाकिस्तानकी ओरसे जम्मू-कश्मीरके कारगिल क्षेत्रपर अवैध ढंगसे अधिकार कर लेनेके पश्चात दोनों देशोंके मध्य युद्ध हुआ था । इसके पश्चात गत २० वर्षोंमें भी यह दोनों देश दो बार आपसमें युद्धकी सीमापर पहुंचकर वापस लौटे हैं !
दोनों ही बार इन देशोंके मध्य युद्ध जैसी परिस्थितियां पाकिस्तानी आतंकी संगठन ‘जैश-ए-मोहम्मद’की देन रही हैं । भारतीय अधिकारियोंका कहना है कि ‘जैश’ने ‘गजवा-ए-हिंद (भारतके विरुध्द जिहाद)’के नामपर दुस्साहसिक आतंकी आक्रमण करते हुए दोनों देशोंके मध्य वार्ताकी गाडी पटरीसे उतारनेमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।
जैशकी ओरसे २० वर्षमें पठानकोट एयरबेस, उडीमें सैन्य ब्रिगेड मुख्यालयपर आक्रमण, श्रीनगरके बादामीबाग कैंटपर आक्रमम और जम्मू-कश्मीर विधानसभापर बमोंसे आक्रमण जैसी घटनाओं की हैं । एक सुरक्षा अधिकारीका कहना है, कारगिल युद्धके पश्चात प्रथम बार भारत और पाकिस्तान २००१ में उस समय लगभग युद्ध छेडनेके निकट पहुंच चुके थे, जब ‘जैश’के आतंकियोंने भारतीय संसदपर आक्रमण किया था । इसके पश्चात अब १४ फरवरीको जैशकी ही ओरसे पुलवामामें ‘सीआरपीएफ’पर फिदायीन आक्रमणके पश्चात भी दोनों देश युद्धपर खडे हुए हैं ।
सुरक्षा अधिकारीके अनुसार, गुप्तचर विभागका ब्यौरा हैं कि जैशके ओसामा बिन लादेनके अल-कायदा आतंकी संगठनसे निकटवर्ती सम्बन्ध हैं । जैशका शीर्ष नेतृत्व २०१७ में भारत-पाकिस्तानके मध्य किसी भी प्रकारकी सन्धिको नहीं माननेकी घोषणा कर चुका है । पाकिस्तानके ओकारा जनपदमें २७ नवंबर, २०१७ को हुए एक सम्मेलनमें जैशके मुखियाओंने ‘गजवा-ए-हिंद’ जारी रखनेकी घोषणा की थी ।
भारतीय संसदपर आक्रमण करानेके पीछे ‘जैश’का उद्देश्य ९/११ के पश्चात अफगानिस्तानके तोरा-बोराकी पहाडियोंकी सुरंगोंमें अमेरिकी सेनासे घिरे ओसामा बिन लादेनकी सहायता करना था ।
जैशने पाकिस्तानी सेनाकी घेरेबंदीके एक सप्ताह पश्चात भारतीय संसदपर आक्रमण कर दिया था, जिससे भारत और पाकिस्तानके मध्य तनावका वातावरण युद्ध आरम्भ होनेतक पहुंच गया था । इस कारण पाकिस्तानको अफगानिस्तान सीमासे सेना हटाकर भारतीय सीमापर लगानी पडी थी और लादेन सरलतासे तोरा-बोरासे निकलकर पाकिस्तान पहुंच गया था, जहां वह अगले १० वर्षोंतक छिपा रहा ।
यह योजना पाकिस्तानी ‘आईएसआई’ने ही बनाई थी । इस मध्य जैशने अल-कायदाके आतंकियों और उनके परिवारोंको भी अफगानिस्तानसे निकालकर पाकिस्तानमें अपने शिविरोंमें सुरक्षित आश्रय दिया था और बादमें इन्ही आतंकियोंका उपयोग भारतके विरुद्घ भी किया ।
२००० अप्रैलमें कश्मीरमें आईईडी विस्फोटसे ३० सैनिकोंकी हत्या की
२००० जूनमें श्रीनगरके बटमालू बस स्थानकपर ३ पुलिसकर्मियोंकी हत्या
२०००१ में १ दिसंबरको जम्मू-कश्मीर विधानसभापर विस्फोटकर ३१ लोगोंकी हत्या
२००१ में ३१ जनवरीको भारतीय संसदपर आक्रमण, ९ सुरक्षाकर्मी व अधिकारियोंकी हत्या
२००५ में २ नवंबरको गुलाम नबी आजादके जम्मू-कश्मीरके मुख्यमंत्री पदकी शपथ लेते ही श्रीनगरके नौगांवमें कार बम विस्फोटसे १० लोगोंकी हत्या
२०१६ में २ जनवरीको पठानकोट एयरबेसपर फिदायीन आक्रमण, दो दिनतक चली मुठभेडमें ७ सुरक्षाकर्मियोंकी हत्या
२०१६ में ही १८ सितंबरको उडीमें सैन्य ब्रिगेड मुख्यालयपर फिदायीन आक्रमणमें १७ सैनिकोंकी हत्या और ३० अन्य चोटिल
२०१९ में १४ फरवरीको पुलवामामें ‘सीआरपीएफ’ दलकी बससे आरडीएक्ससे भरा वाहन टकराकर ४० सैनिकोंकी हत्या !
“ऐसे आतंकी संगठनोंका अन्त काफी समय पूर्व ही हो जाना चाहिए था; परन्तु अमेरिकाके वर्तमान राष्ट्रपति ट्रम्पने ही पाकिस्तानको सहायता देनी बन्द की है, उससे पूर्व पाकिस्तान भी अमेरिकासे धन पाता रहा और पाकिस्तान उस धनसे आतंकका पोषण करता रहा और अब पाकिस्तानकी सहायता चीन कर रहा है । ऐसेमें आतंकका अन्त कैसे होगा ? यदि विश्वमें शान्ति बनाए रखना चाहते हैं तो सभी राष्ट्रोंको मिलकर साथ आना होगा और आतंकका अन्त करना होगा ! ”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : अमर उजाला
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