आनंद, सुख और दुखसे परेकी स्थिति होती है ! जब तक साधकका मन बाह्य सुखकी ओर भागता है और दुखसे व्यथित हो जाता है, उसे समझना चाहिए कि उसने आनंदकी अनुभूति नहीं चखी है अर्थात खरे अर्थोंमें साधना आरंभ नहीं हुई है क्योंकि जिसे आनंदकी अनुभूति हो चुकी होती है उसका मन सांसरिक विषयोंकी ओर नहीं भागता है और न ही दुखोंसे व्यथित होता है ! अतः जब जीवनमें दुख आए तो मनको साधना और सेवामें रमायें मन जैसे ही आनंदकी अनुभूति लेने लगेगा, दुखकी संवेदनाएं दूर हो जाएंगी | उसी प्रकार सुखमें मन लिप्त न हो इस हेतु सुखके क्षणोंमें भी साधना करें, आप विषयोंमें रहकर भी अलिप्त रहंगे ! इस प्रकार निरंतर प्रयास करते रहनेसे और सुख हो या दुख मन अविरत आनंदकी अनुभूति लेने लगेगा ! -तनुजा ठाकुर
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