दिसम्बर १७, २०१८
कांग्रेसके वरिष्ठ नेता और दिल्लीसे सांसद रहे सज्जन कुमारको १९८४ के सिख विरोधी उपद्रव प्रकरणमें उच्च न्यायालयसे आजीवन कारावासका दण्ड सुनाए जानेके पश्चात एक बार पुनः यह प्रकरण ताजा हो गया है । ३४ वर्षोंसे इनके पीडितोंको न्यायकी आशा है । आज भी इसके कई पीडितोंके घाव पहलेकी भांति ही है । ऐसे सैकडों लोग हैं, जिनके सामने उनके अपनोंको मार डाला गया । इनमें स्वाहा हुए कई घरोंमें वर्षों तक कालिख साफ करने वाला भी सामने नहीं आया । कांग्रेसी नेताओंपर इसको लेकर बार-बार आरोप लगते रहे । सज्जन कुमारका नाम और उनको मिला दण्ड इसका ही एक भाग है । जनवरीमें इस बारेमें जब न्यायालयने इससे सम्बन्धित १८६ ऐसे प्रकरणको पुनः खोलनेकी बात कही, जिन्हें पूर्वमें बंद कर दिया गया था, तो इसके पीडितोंका पुनः विश्वास जगा था ।
उल्लेखनीय है कि पूर्व प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधीकी हत्याके पश्चात देश भरमें सिख विरोधी दंगे भडके थे, जिसमें सहस्रों सिखोंके प्राण गए थे, साथ ही उनकी सम्पत्तिको भी हानि पहुंचाई गई थी । १६ अगस्त २०१७ को उच्चतम न्यायालयने एक समितिका गठन किया था, जिसे शासनद्वारा गठित एसआइटीद्वारा बंद किये गए २४१ प्रकरणकी जांच सौंपी थी । समितिद्वार दिज विवरणपर तत्कालीन मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्राकी अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठने कहा था कि एसआइटीने २४१ मेंसे १८६ प्रकरणकी आगे जांच नहीं की । न्यायालयने कहा कि जांचके लिए उच्च न्यायालयके सेवानिवृत न्यायाधीशकी अध्यक्षतामें तीन सदस्यीय एसआइटी गठित की गई । न्यायालयने तत्कालीन एएसजी पिंकी आनंद और याचिकाकर्ताके अधिवक्ता एचएस फूलकासे तीन नाम देनेको कहा था । इसके अतिरिक्त कानपुरमें इस मध्य मारे गए १२७ सिखोंके प्रकरणकी जांच भी एसआईटीसे करानेकी मांग की गई थी ।
इंदिरा गांधीकी हत्याके पश्चात १९८४ में हुए सिख विरोधी उपद्रवमें ३००० से अधिक लोगोंको अपने प्रण गंवाने पडे थे । २००० से अधिक लोग केवल देहलीमें ही मारे गये थे । नरंसहारके बाद सीबीआईने कहा था कि ये उपद्रव राजीव गांधीके नेतृत्व वाले कांग्रेस शासन और देहली पुलिसने मिल कर कराए थे !
इनको लेकर कुछ कांग्रेसी नेताओंका राजनीतिक भविष्य पूर्ण रूपसे समाप्त हो गया है । इनमें जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार समेत कुछ दूसरे नेताओंका भी नाम सम्मिलित है । २०१० में इनमें संलिप्तताको लेकर कमलनाथका भी नाम सामने आया था ।
आपको यहां पर ये भी बता दें कि इस उपद्रवकी आंच और आरोपोंसे पूर्व प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव भी स्वयंको नहीं बचा सके थे । १९८४ में हुए उपद्रवके समय वह केन्द्रीय गृहमन्त्री थे ।
“देशमें उपद्रव करवाकर हत्याएं करवाने वाले सांसद बनकर हमपर राज करते हैं, यह इस तथाकथित लोकतन्त्रकी अभूतपूर्व देन है । कांग्रेसके मुख्य नेता इस नरसंहारमें सम्मिलित थे, यह स्पष्ट है और जो विशेष जांच दल बैठाया गया था, जिसने प्रकरणको बन्द किया, उसपर भी शंका उठती है, न्यायालय उसकी भी समीक्षा करें और इससे यह भी स्पष्ट है कि किसप्रकार कांग्रेसने न्यायप्रणालीको प्रभावित किया जिससे दोषी अभी तक बचते आए हैं और यह सब पूर्व न्यायधीश पहले ही बता चुकें हैं कि किसप्रकार न्यायप्रणाली पूर्वमें किसी बाहरी नियन्त्रणमें कार्यरत होती थी !” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जागरण
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