१ % क्रियमाण कर्मसे भी सभी संचित कर्मोंको नष्ट कर मोक्षप्राप्ति कर सकते हैं !


अध्यात्ममें क्रियमाण कर्मका बहुत महत्त्व है, हमारे श्रीगुरुके अनुसार १ % क्रियमाण कर्मसे भी हम अपने सभी संचित कर्मोंको नष्टकर जीवनमुक्त ही नहीं हो सकते हैं अपितु मोक्षप्राप्ति भी कर सकते हैं  ! जैसे एक व्यक्तिका आध्यात्मिक स्तर यदि ५० % है और वह साधनाके अगले चरणमें जाने हेतु कुछ भी योग्य प्रयास न करता हो तो वह उसी आध्यात्मिक स्तरपर स्थिर रह जाता है और जो साधक मान लें ४० % आध्यात्मिक स्तरपर हो, वह यदि योग्य प्रकारसे धर्माचरण करे तो वह कुछ समयमें ५० % वालेसे आगे निकल जाता है ! इस तथ्यकी निम्नलिखित शास्त्र वचन बहुत सुन्दरसे पुष्टि करता है !

गच्छन् पिपिलिको याति योजनानां शतान्यपि ।

अगच्छन् वैनतेयः पदमेकं न गच्छति ॥

अर्थ :  लगातार चल रही चींटी सैकडों योजनकी दूरी तय कर लेती है; परंतु न चल रहा गरुड एक पग आगे नहीं बढ पाता है ।

यह मैं क्यों बता रही हूं ?; क्योंकि अनेक साधक जिनका आध्यात्मिक स्तर कम होता है उन्हें लगता है कि वे समष्टि साधना उतने अधिक प्रमाणमें नहीं कर सकते हैं जितना उनसे अधिक आध्यात्मिक स्तरवाले व्यक्ति कर सकते हैं; किन्तु यदि उच्च आध्यत्मिक स्तर होनेपर भी कोई व्यक्ति योग्य पुरुषार्थ न करें तो वह वहीं स्थिर रहता है एवं कई बार अयोग्य कर्म करनेपर नीचे भी गिर जाता है, वहीं जिनका आध्यात्मिक स्तर कम है, यदि वे श्रद्धा और सातत्यसे साधना करते रहें तो उनकी आध्यात्मिक प्रगति होती रहेगी | ईश्वर अपना कार्य उनसे ही करवाते हैं जिनमें ईश्वरके प्रति भाव होता है एवं धर्मकार्य करने हेतु उत्कंठा होती है | साथ ही, जो ईश्वरके कार्य हेतु स्वयंमें आवश्यक पात्रता निर्माण करने हेतु सतत प्रयास करता है ! ईश्वर हमें अपने कार्य हेतु चुने, इसके लिए आध्यात्मिक स्तरका महत्त्व १० % ही होता है, अन्य घटकोंका अधिक महत्त्व होता है |



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