कोई भी साधक साधना क्यों करता है ? यदि इस प्रश्नका उत्तर ढूंढा जाए तो इसका मुख्य कारण होगा, आनन्दकी प्राप्ति हेतु और आनन्दकी प्राप्तिमें सबसे बडे बाधक होते हैं, हमारे दोष एवं अहंकार । दोष और अहंकारका प्रमाण जितना न्यून (कम) होगा, साधक उतना ही अधिक आनन्दमें रहेगा । सन्त आनन्दमें क्यों रहते हैं; क्योंकि उनके मनके संस्कार न्यून हो चुके होते हैं या नष्ट हो चुके होते हैं (मात्र परात्पर पदके सन्तोंके अधिकांश संस्कार नष्ट हो चुके होते हैं) ।
हमारी आत्माका मूल स्वरुप सत्-चित-आनन्द है तो साधकको उसकी अनुभूति क्यों नहीं होती है ? क्योंकि उसपर इस जन्म एवं पूर्व जन्मोंके संस्कार आच्छादित होते हैं और इन संस्कारोंको नष्ट करनेकी प्रक्रियाको ही साधना कहते हैं । स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया इस संस्कारोंको नष्ट करनेका मानसिक माध्यम है एवं नामजप, सत्संग, सेवा, त्याग आदि आध्यात्मिक माध्यम है । यदि किसी साधक या मुमुक्षुको शीघ्र अपने संस्कारोंको नष्ट कर उस सच्चिदानन्द परब्रह्मकी अनुभूतिकी पानेकी उत्कण्ठा है तो उसे इस प्रक्रियाको प्रमाणिकता एवं सातत्यसे करना चाहिए । यहां संस्कारका आध्यात्मिक अर्थसे प्रयोग किया गया है एवं उसका अर्थ है विचारोंके केन्द्र या पुंज जैसे रुचि-अरुचि संस्कार, क्रोधका संस्कार इत्यादि । – तनुजा ठाकुर (२८.९.२०१७)
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