साधक क्यों करे स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया ? (भाग – ८)


साधनाको संग्रहित करने हेतु करें यह प्रक्रिया
जैसे एक घडेमें बहुतसे छिद्र हों और हम उसमें जल डालते जाएं तो जल कभी भी एकत्रित नहीं होगा, उसीप्रकार नामजप, सत्सेवा, त्याग, इत्यादि करनेसे जो आध्यात्मिक ऊर्जा एकत्रित होती है, वह दोषोंके कारण निर्माण होनेवाले पापकर्मके क्षालनमें नष्ट हो जाती है । साधनाके प्रयासोंसे एकत्रित आध्यात्मिक शक्ति, साधककी कुण्डलिनीमें स्थित सूक्ष्म चक्रोंके भेदनमें स्वतः ही उपयोग होती है; किन्तु यदि एक साधक प्रतिदिन ग्यारह माला जप करता है और कोई भी विपरीत प्रसंग होनेपर किसीको तीन अपशब्द कहता है तो उसकी पन्द्रह माला जपकी शक्ति नष्ट हो जाती है ! अर्थात दोषोंके कारण, साधनामें वृद्धि होनेकी अपेक्षा उस निर्माण हुए पापकर्मको नष्ट करनेमें साधनाकी शक्ति क्षीण होती है एवं प्रतिदिन चूकें अधिक हों तो साधनामें अधोगति होती है । अब आपको समझमें आ रहा होगा कि बहुत साधना करनेपर भी अनेक साधकोंपर ईश्वरीय कृपाका संचार क्यों नहीं होता है ?
  जैसे एक जिज्ञासु इसलिए भावसत्संगमें सम्मिलित नहीं हुए; क्योंकि उनकी बहनके नवजात पुत्र चिकित्सालयमें गम्भीर अवस्थामें था । वह जिज्ञासु देहलीमें था और उनकी बहन चण्डीगढमें; अर्थात वह वहां उपस्थित नहीं रह सकता था; इसलिए बैठकर रो रहा था ! यदि उसने अपनी आसक्ति (मोह) रुपी दोषपर पूर्वसे ही मात करने हेतु उपाय किए होते तो वह सत्संगमें सम्मिलित हो सकता था । रोनेसे ईश्वरकी कृपा नहीं मिलती है, इसकी अपेक्षा यदि वह सत्संगमें उपस्थित रहता तो उसे उस विपरीत परिस्थितिमें भी आनन्द मिलता एवं ईश्वरीय कृपा उनकी बहनपर भी हो सकती थी । यह तो मैंने मोहके कारण किसप्रकार साधनामें अडचन आती है, इसका एक उदहारण बताया है । इसीप्रकार काम, क्रोध, लोभ, मद एवं मत्सरके कारण प्रत्येक दिवस साधकसे इसीप्रकारके अनेक अयोग्य आचरण होते हैं; अतः साधनाका क्षय न हो एवं वह संग्रहित रह सके इस हेतु दोषोंका निर्मूलन करनेवाली इस प्रक्रियाको साधकने अवश्य करना चाहिए । – (३०.९.२०१७)



One response to “साधक क्यों करे स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया ? (भाग – ८)”

  1. Kripa Shankar says:

    साधुवाद इस प्रस्तुति के लिए | ॐ ॐ ॐ !!

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