
जून 1994 से ही पूर्ण समय नामजप करने का प्रयास करती थी और ईश्वर कृपा से दिसम्बर 1996 तक नामजप अजपा (स्वतः और सदैव) होने लगा था |
वर्ष 1997 की बात है मुझे मेरे श्रीगुरु से जुड़े दो महीने भी नहीं हुए थे मैं कार्यालय में कुछ समय के लिए कुछ काम नहीं देख उनेक द्वारा लिखित ग्रंथ पढ़ने लगी | अचानक ही ग्रंथ पढ़ते समय मैं अपने नाम जप को सुन पा रही थी वह अत्यंत धीमे गति में और लयबद्ध हो रहा था | मैं ग्रंथ पढ़ना छोड़ नाम जप का आनंद ले रही थी और शायद ध्यानस्थ हो गयी थी कि तभी हमारे सामने के कार्यालय के एक वृद्ध और धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति ने मेरे मेज पर ज़ोर से एक ग्रंथ रखते हुए कहा इसे पढ़ो अत्यधिक ज्ञान वर्धक है, कुछ क्षणों के लिए ईश्वर से मेरी अंतरंगता टूट जाने पर मेरा मन चिड़चिड़ा हो गया परंतु मैंने अपनी भावनाओं को नियंत्रित करते हुए उनके ग्रंथ को ग्रहण कर ली | मैं सोचने लगी कि क्या इन्हे इसी क्षण आना था इन्हे मेरे ध्यान को भंग करने ? फिर मैंने सोचा हो सकता है इस ग्रंथ के माध्यम से ईश्वर मुझे कुछ सीखाना चाहते हों मैंने ग्रंथ के पन्ने को पलटकर देखना आरम्भ किया उसमे संत के संदर्भ में अनेक प्रसंग और कथाएँ थीं | मैंने मध्य के पन्ने से एक कथा पढ़नी आरंभ की | कथा कुछ इस प्रकार थी |
संत कबीर के बढ़ते प्रसिद्धि को देख कुछ काशी के पंडितो को द्वेषवश कष्ट होने लगा | वे कबीर के पास गए और और उनकी गुरु परंपरा के बारे में पूछा | कबीर ने कहा, “ मेरे गुरु रामानन्द महाराज है उन्होने ही मुझे गुरुमंत्र दी थी और उनकी कृपा के कारण ही आज मैं आनंद में रेहता हूँ “ | पंडितों को उनकी प्रसिद्धि का द्वेष तो था ही रामानन्द महाराज से जाकर पूछने लगे “ जिसके जन्म और जाति का ठिकाना नहीं उसे आपने शिष्य कैसे बना लिया ?” रामानन्दजी कहने लगे “ मैंने किसी कबीर को शिष्य नहीं बनाया मैं तो उसे जानता तक नहीं “ पंडित बोले पर वे तो सीना तान कर कहते हैं कि आप ही उनके गुरु है और आपने उन्हे गुरुमंत्र भी दी है | कबीर के बारे वह प्रसंग तो आप को पता ही होगा कि उनकी इच्छा थी रामानन्द महाराज से उन्हे दीक्षा मिला पर उन्हे पता था कि ऐसा संभव नहीं अतः वे काशी के गंगा के घाट के रास्ते में मुह अंधेरे लेट गए उन्हे पता था कि गुरु महाराज प्रतिदिन इसी मार्ग से गंगा स्नान हेतु पौ फटने से पहले ही जाते हैं अतः उनसे दीक्षा लेने का यह सर्वोत्तम मार्ग है | और वैसा ही हुआ अंधेरे में रामानन्द जी ने उनके सीने पर अपने चरण रख दिया और ऐसा होते ही उनके मुख से ‘राम राम’ निकाल पड़ा | कबीर दस जी चुपचाप श्रीगुरु के चरणों के स्पर्श और उनके मुखारविंद से निकला ‘राम मंत्र’ को गुरु मंत्र मान वहाँ से निकल गए |
अब जब रामानन्द महाराज ने कह दिया कि कोई कबीर को नहीं जानते तो पंडितों ने कबीरदास को नीचा दिखने के लिए धर्म सभा बुलाई |उस समय धर्मसभा बड़े बड़े मंदिरों कि सीढ़ियों पर लगते थे जहां ऐसे छोटे-मोटे प्रसंगों का विषय सुलझाया जाता था | सभा आरंभ हुई रामानन्द जी ने कबीरदास को डांट कर अपने पास बुलाया | वे एक सीढ़ी ऊपर थे और शिष्य कबीर एक सीढ़ी नीचे | रामानंदी संप्रदाय के संत अपने साथ एक चिमटा समान रखते थे , गुरुजी ने शिष्य को एक चिमटा से मारते हुए कहा “ क्यों मैंने कब तुम्हें शिष्य स्वीकार किया बता , राम राम ?” उनकी आदत ही प्रत्येक वाक्य में राम राम कहने की और दूसरा चिमटा पुनः मारा और कहने लगे “ झूठ बोलता है कि मैंने तुझे गुरुमंत्र दी है राम राम |” तीसरा चिमटा मारते हुए कहा “ सबके सामने सच सच बता, राम राम” | कबीरदास जी बड़ी विनम्रता से सबके सम्मुख हुए और कहने लगे “ उस दिन गुरु महरज ने अंधेरे में अपने चरणों के स्पर्श होने दिये और ‘राम राम’ का मंत्र दिया और आज सबके सामने अपने आशीर्वाद का छाप मेरे पीठ पर दे दी और क्या कहूँ इनकी कृपा के बारे में और अपनी पीट दिखाई जिसमे तीन चिमटे का दाग स्पष्ट दिखाई दे रहा था | गुरु तो गुरु होते हैं ऐसी भक्ति देख उनके आँखों में आँसू आ गए , उन्होने “ अब चाहे काशी के सारे पंडित मेरा बहिष्कार करे आज से तू मेरा शिष्य और मैं तेरा गुरु , राम राम” !!! यह कह शिष्य को गले से लगा लिया और दोनों के आँखों के अश्रुधारा देख सब पंडित पानी पानी हो गए |
मै यह कथा पढ़ मुस्कुराने लगी, बचपन से उस निर्गुण ईश्वर से जिसे मैं भगवानजी कहती हूँ उनसे बातचीत करती थी | मैंने भगवानजी से कहा अब समझ गयी मेरा ध्यान भंग कर मुझे यह कथा क्यो पढ़ाई | मेरे श्रीगुरु द्वारा लिखे ग्रंथ के प्रथम पन्ने पर उनका चित्र रहता है । उनकी चित्र कि ओर देखकर कहन लगी “ नाथ, अहम नहीं कर रही परंतु यदि इस संसार में आपका यदि एक भी शिष्य हुआ तो उसमे एक नाम मेरा भी होगा और उस पद को पाने के लिए अब जो भी करना पड़े वह करने को तैयार हूँ | सूक्ष्म से भगवानजी बोले “ सोच लो बड़ा कठिन संकल्प ले रही हो सीता को तो एक अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी शायद तुम्हें अनेक देने पड़े क्या तुम तैयार हो “? मैंने कहा “हाँ “। और उस दिन से अग्नि परीक्षाओं का दौर चल पड़ा और वह अभी तक चल ही रहा है !!!! मात्र जैसे सीता उससे सुरक्षित निकल कर आ गयी वैसे ही उनकी कृपा से सब परीक्षाओं में वे ही उत्तीर्ण करवा देते हैं !!
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