श्रीगुरु उवाच


जब कोई भक्त मेरे पास आता है, तब मैं उसके भूतकालको नहीं देखता, वह भविष्यमें क्या कर सकता है मैं यह देखता हूं | – परम पूज्य भक्तराज महाराज (परम पूज्य गुरुदेव डॉ. जयंत आठवलेके श्रीगुरु )
भावार्थ : जो भी जिज्ञासु या साधक संतके द्वार जाता है, संत उसके भूतकालमें जाकर यह नहीं देखते कि उसने कौन-कौनसे पाप किए हैं बल्कि यह देखते हैं कि उसमें मुमुक्षुत्त्व कितना है, वह किस प्रकार साधना कर अपने संचित कर्मको जलाकर ईश्वर प्राप्तिकी ओर अग्रसर हो सकता है | साधनाके तपने रत्नाकर डाकूको वाल्मीकि ऋषि बना दिया क्योंकि नारद ऋषिने उन्हें भी सुधरनेकी संधि देकर साधनाके संस्कार उनके मनपर अंकित किए | इस प्रकार संत प्रत्येक जीवको सुधरनेकी संधि देते हैं | खरे अर्थोंमें अपने साधना रूपी क्रियामान कर्मके माध्यमसे साधक अपने संचित कर्मोंके भंडारको नष्ट करनेकी क्षमता रखता है | मातृत्त्व, क्षमाशीलता, निरपेक्ष प्रेम एवं सकारात्मक सोचके प्रतिबिंब होते हैं संत !– तनुजा ठाकुर


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