संस्कृत भाषाके अध्ययनका प्रारम्भ व्याकरणसे ही होता है । आरंभमें व्युत्पत्ति सीखते थे । व्युत्पत्ति अच्छी होनेपर गुरुके बिना साहित्य ग्रंथ पढे जा सकते हैं । आगे शब्दव्युत्पत्ति सीखाते थे । व्याकरणके ‘लघुसिद्धान्त कौमुदी’ एवं ‘अष्टाध्यायी’ सीखने पडते हैं । यह प्राथमिक सिद्धता घरमें ही पिताके पास होती थी । यह सिद्धता होनेके उपरांत पाठशालामें जाते थे ।
उपर्युक्त सुवचन ‘सनातन संस्था’ द्वारा प्रकाशित ग्रंथ ‘देव वाणी संस्कृतके विशेषताएं’ से उद्धृत है । इस ग्रंथको आप इस लिंकसे ऑनलाइन प्राप्त कर सकते हैं ।http://sanatanshop.com/shop/hn/swabhashabhiman/248-devwani-sanskrutaki-visheshtaye-evam-sanskrutaki-surakshake-upay.html
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