शिव स्तुति


प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं
गङ्गाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् ।
खट्वाङ्गशूलवरदाभयहस्तमीशं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥

अर्थ : उन शिवका मैं प्रातः समरण करती हूं जो सांसरिक भयका हरण करनेवाले हैं जो देवोंके ईश हैं, जो गागंधर हैं जिनके वाहन वृषभ है और जो माता अंबिकाके ईश हैं, जो खटवांग (एक ऐसा शस्त्र जिसके दंडके ऊपर खोपडी होती है) और त्रिशूलको दो हस्तोंमें धारण किए हैं और जो शेष दोनों हस्तोंसे वर देते हैं एवं भयका नाश करते हैं, जो ईश्वर स्वरूपी हैं जो अपने औषधिसे सांसरिक बंधन रूपी रोगका नाश करते हैं और जो अद्वितीय हैं ।



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