गीता सार


krushan (75)लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ – श्रीमदभगवद्गीता (५:२५)

अर्थ :  जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञानद्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभावसे परमात्मामें स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्मको प्राप्त होते हैं |

भावार्थ : प्रारब्धका भोग योगियोंको भी भोगना पडता है; परंतु इस साधनासे प्राप्त हुए तपोबलके माध्यमसे संचित अर्थात पूर्व जन्मोंके पाप और पुण्य नष्ट हो जाते हैं और प्रारब्ध अनुसार संतोंको मात्र देहके माध्यमसे दुख भोगने होते हैं जिसे देह प्रारब्ध भी कहते हैं और जिनका मन ब्रह्म तत्त्वमें स्थित हो जाये उन्हें देहके दुख भी दुख नहीं प्रतीत होते हैं क्योंकि मन जो सुख और दुखका अनुभव करता है उसका भी लय साधनाके माध्यमसे हो चुका होता है अतः एक प्रकारसे ऐसे व्यक्तिके दुखका अर्थात पापोंका अंत हो चुका होता है | योग्य और प्रखर साधनामें इतना बल होता है कि कि वह हमारे सर्व पापोंका क्षालन करनेमें सक्षम होता है |

जब तक मनमें शंका या संशय उभरता है तब तक हमें सत्यका साक्षात्कार नहीं हुआ है ऐसा समझ सकते हैं एवं आत्मतत्त्वकी अखंड प्रचीतिके पश्चात संशय नष्ट हो जाता है इसे ही ज्ञान होना कहते हैं | अपने संचितको नष्ट करने और ज्ञान होनेके पश्चात भी जो मानव मात्रके कल्याण एवं उत्थान हेतु निस्पृह होकर अखंड कर्मरत रहते हैं ऐसे ब्रह्मवेताको शांतिके तत्त्वकी अनुभूति होती है |

अध्यात्ममें शांतिकी अनुभूतिको सर्वोच्च स्थिति माना गया है उससे पूर्व आनंद अवस्थाकी अनुभूति अनुभूति होती और सबसे नीचले स्तरपर शक्तिकी प्रचीति होती है |

शांति या ब्रह्मनिर्वाणकी अवस्थामें स्थित योगीको सर्वोच्च स्तरका योगी माना गया है |

सनातन धर्ममें योगियोंने समाजाभिमुख होकर अपने चिंतन और साधनाको समाज हित हेतु अर्पित करना चाहिए, यह श्लोक इसका अति सुंदर उदाहरण है |

यथार्थमें आनंद अवस्था जो अस्सी प्रतिशत आध्यात्मिक स्तरसे आगे प्राप्त होता है, उसकी अनुभूति लेनेके पश्चात यदि वह योगी समाज हितमें अकर्ता रहकर कर्मरत रहता है उसे शांति अर्थात ९० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर स्वतः ही प्राप्त हो जाता है और वह उससे आगे परम     शांतिकी स्थिति जो साध्य करने की ओर मार्गक्रमण करने लगता है |

-तनुजा ठाकुर



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