धनकी भिन्न गतियां


दानं भोगो नाशस्तिस्रोगतयो भवन्ति वित्तस्य ।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥       

अर्थ : धनकी तीन ही गति होती है, दान भोग या नाश, जो धनका सदुपयोग दानमें या स्वयंके सुख हेतु नहीं करते हैं, उनका धन तीसरी गति अर्थात् नाशको (चोरी, धोखाधडी, अग्नि, रोग या लूटके माध्यमसे) प्राप्त होता है !
(जैसा काल आनेवाला है, कहीं स्विस बैंकमें इस देशके दुर्जनोंद्वारा संरक्षित काले धनको भी तीसरी गति प्राप्त न हो जाए !! ) – तनुजा ठाकुर



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