पापी और पुण्यात्माओंके लोक


 

 

 

 

 

 

 

 

आसंयोगात् पापकृतांपापांस्तुल्यो दण्ड: स्पृशते मिश्रभावात् ।
शुष्केणार्द्रं दह्यते मिश्रभावान्न मिश्र: स्यात् पापकृद्भि कथंचित् ।।
पुण्यस्य लोको मधुमान् धृतार्चिर्हिरण्यज्योतिरमृतस्य नाभि: ।
तत्र प्रेत्य मोदते ब्रह्मचारी न् तत्र मृत्युर्न जरा नोत दु:खं ।।
पापस्य लोको निरयोSप्रकाशो नित्यं दु:खं  शोकभूयिष्ठमेव ।
तत्रात्मानं शोचति पापकर्मा बह्वीः समा: प्रत्पन्नप्रतिष्ठ: ।। – महाभारत शांतिपर्व ७३:२३, २६,२७
अर्थ :
जैसे सूखी लकडियोंके साथ गीली लकडी भी जल जाती है, उसी प्रकार पापियोंके संपर्कमें रहनेसे धर्मात्माओंको भी उनके समान दण्ड भोगना पडता है; इसलिए पापियोंका संग कभी नहीं करना  चाहिए । पुण्यात्माओंको मिलनेवाले सभी लोक मधुर सुखकी खान और अमृतके केंद्र होते हैं । वहां घीके दीपक जलते हैं । उनमें सुवर्णके सामान प्रकाश फैला रहता है । वहां न मृत्युका प्रवेश है, न वृद्धावस्थाका । उनमें किसीको कोई दुःख भी नहीं होता । ब्रह्मचारी व्यक्ति मृत्युके पश्चात् उन्हीं लोकोंमें जाकर आनंदका अनुभव करते हैं । पापियोंका लोक है नरक, जहां सदा अंधेरा छाया रहता   है । वहां अधिक-से-अधिक शोक और दुःख प्राप्त होते हैं । पापात्मा पुरुष वहां बहुत वर्षोंतक कष्ट भोगते हुए अस्थिर एवं अशांत रहते हैं, उन्हें अपने लिए बहुत शोक होता है ।

 



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