
सर्वतो मनसोsसङ्गमादो संगं च साधुषु |
दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भुतेष्वद्धा यथोचितं ||
अर्थ : पहले शरीर, संतान आदिमें मनकी अनासक्ति सीखें | तत्पश्चात् भगवानके भक्तोंसे प्रेम कैसा करना चाहिए, यह सीखें | इसके पश्चात् प्राणियोंके प्रति यथायोग्य दया, मैत्री और विनयकी निष्कपट भावसे शिक्षा ग्रहण करें |