
दोषहेतूनशेषांच्श वश्यात्मा यो निरस्यति ।
तस्य धर्मार्थकामानां हानिर्नाल्पापि जायते ।
सदाचाररतः प्राज्ञो विद्याविनयशिक्षितः ।
पापेऽप्यपापः परुषे ह्यभिधत्ते प्रियाणी यः ।
मैत्रीद्रवान्तःकरणस्तस्य मुक्तिः करे स्थिता ।।
ये कामक्रोधलोभानां वीतरागा न गोचरे ।
सदाचारस्थितास्तेषामनुभावैर्धृता मही ।।
(विष्णु० ३। १२ । ४०-४२ )
अर्थ : जो मनको वशमें रखनेवाला पुरुष दोषके समस्त हेतुओंको त्याग देता है, उसके धर्म, अर्थ और कामकी थोडी-सी भी हानि नहीं होती । जो विद्या-विनय-सम्पन्न, सदाचारी प्राज्ञ पुरुष पापीके प्रति पापमय व्यवहार नहीं करता, कटु वचन बोलनेवालेके प्रति भी प्रिय भाषण करता है तथा जिसका अंत:करण मैत्रीसे द्रवीभूत रहता है, मुक्ति उसकी मुठ्ठीमें रहती है, जो वीतराग महापुरष कभी काम, क्रोध और लोभादिके वशीभूत नहीं होते तथा सर्वदा सदाचारमें स्थित रहते है, उनके प्रभावसे ही पृथ्वी टिकी हुई है ।