समाहितो ब्रह्मपरो प्रमादी शुचिस्तथैकान्तरतिर्जितेन्द्रियः: ।
समाप्नुयाद् योगमिमं महामना विमुक्तिमाप्नोति ततच्श योगत: ।।
कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुन्धरा भाग्यवती च तेन ।
विमुक्तिमार्गे सुखसिन्धुमग्नं लग्नं परे ब्रह्मणि यस्य चेत: ।।
– (स्कन्द० मा० कुमा० ५५/१३९-१४०)
अर्थ : जो एकाग्रचित; ब्रह्मचिन्तनपरायण, प्रमादशून्य, पवित्र, एकान्तप्रेमी और जितेन्द्रिय है, वह महामना योगी इस योगमें सिद्धि प्राप्त करता है और उस योगके प्रभावसे मोक्षको प्राप्त हो जाता है । जिसका चित्त मोक्षमार्गमें आकर परब्रह्म परमात्मामें संलग्न हो सुखके अपार सिन्धुमें निमग्न हो गया है, उसका कुल पवित्र हो गया, उसकी माता कृतार्थ हो गई तथा उसे प्राप्त करके यह पृथ्वी भी सौभाग्यवती हो गई ।
इस शास्त्र वचनके विपरीत आजके माता-पिता अपनी सन्तानोंको भोगकी ओर प्रवृत्त करते हैं और इस कारण भोगियोंकी संख्यामें वृद्धिसे इस वसुन्धराका भार बढ गया है और वह कुपित है ! आजके धर्मविहीन माता-पिता अपनी सन्तानोंको धर्मसे विमुख कर सांसारिक सुख और यशकी ओर प्रवृत्त कर अपने आपको धन्य समझते हैं । भोगी सन्तानकी प्रवृत्ति स्वार्थी होती है; इसलिए वह अपने माता-पिताका सम्मान एवं वृद्धावस्थामें सेवा-सुश्रुषा नहीं करते, इसीलिए आजके पालक स्वयं भी दुखी रहते हैं एवं उनकी सन्तानें भी क्लेशमें रहती हैं । वस्तुतः अपनी सन्तानोंको धर्मकी ओर उन्मुख करनेवाले माता-पिताके विषयमें ‘मातृ देवो भव’ एवं ‘पितृ देवो भव’ कहा गया है । भोगवादी माता-पितामें, जो अपनी सन्तानोंको क्षणिक सुखमें प्रवृत्त करते हैं एवं साधनासे दूर रखते हैं, वे आदरके पात्र कैसे हो सकते हैं और उनकी सन्तानें कुलदीपक कैसे बन सकती हैं ? किञ्चित सोचें !