विक्रम संवत् अनुसार फाल्गुन (शक संवत् अनुसार माघ कृष्ण पक्ष त्रयोदशीको) कृष्ण पक्ष त्रयोदशी अर्थात् २४ फरवरी २०१७ को शिवरात्रि है; अतः हम इस उपलक्ष्यमें भगवान् शिवके नामकी महिमाके विषयमें जानेंगे।
अ. स्तर अनुसार सगुण और निर्गुण स्वरूपकी साधना करना आवश्यक
हमारे धर्म शास्त्रोंमें ईश्वरके दो रूप बताए गए हैं, एक है सगुण एवं दूसरा है निर्गुण । वास्तवमें दोनों रूप परस्पर अभिन्न हैं । निर्गुण ब्रह्ममें निष्क्रियता होनेसे गुणका होना सम्भव नहीं तथापि वही मायामें प्रविष्ट होकर भक्तोंके रक्षणार्थ, धर्मसंस्थापनार्थ जप पूजा इत्यादि हेतु निर्गुणसे सगुण रूप धारण कर लेते हैं । स्वरूप भेदसे उपासनामें भी भेद है, एक निर्गुण उपासना कहलाती है और दूसरी सगुण उपासना । इनमें निर्गुण उपासना अत्यन्त क्लिष्ट है एवं ६०% आध्यात्मिक स्तर होनेपर ही निर्गुण उपासना सहज हो पाती है । इसीलिए साधनाके आरम्भिक कालमें सगुण उपासना करना अधिक सरल होता है ।
आ. सगुण साधना
आ. १. सगुण साधना उपासनाके प्रकार
शिव पुराणकी वायु संहितामें सगुण उपासनाके आठ भेद बतानेवाला एक श्लोक इसप्रकार है –
मद्भक्तजनवात्सल्यं पूजायाञ्चानुमोदनम् ।
स्वयमप्यर्चनञ्चैव मदर्थं चाङ्गचेष्टितम् ।।
मत्कथाश्रवणे भक्ति: स्वरनेत्राङ्गविक्रिया: ।
ममानुस्मरणं नित्यं यश्च मामुपजिविति ।।
एवमष्टविधे चिन्हं यस्मिन मलेच्छsपि वर्तते ।।
अर्थात् भक्तोंमें प्रीति, पूजाका अनुमोदन, स्वयं अर्चना करना, प्रभुके निमित्त अंगोंकी चेष्टा करना तथा श्रवणमें अभिरुचि, स्वर नेत्र और अंगोंकी विक्रिया, भगवानका नित्य स्मरण एवं उनका ही आश्रय, इसप्रकारके लक्षण जिसमें हो वही सर्वश्रेष्ठ है, चाहे वह मलेच्छ ही क्यों न हो ।
आ. २. नवधा भक्ति अनुसार सगुण साधनाके चरण
नवधा भक्ति अनुसार श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य एवं आत्मनिवेदन भक्तिके ये सभीप्रकार समान फलदायी हैं, तथापि इनमें स्मरण विशेष रूपसे उल्लेखनीय है । निरन्तर नामस्मरणसे मनुष्यका अन्तःकरण शुद्ध होकर हृदयमें एकप्रकारकी आत्मशक्ति उत्पन्न होती है, जो अत्यन्त शीघ्रतासे उसको अपना अभीष्ट फल प्राप्त करा देती है ।
इ. शिव एवं शिवके नामकी महिमा
१. शिव नाम है परब्रह्म स्वरूप
वैसे तो भगवान शिवके अनेक नाम हैं; किन्तु भगवान शिव स्वयं कहते हैं –
शिव इत्यस्ति यन्नाम तद्धि नमोत्त्मोत्तमम् ।
तदेव परम् ब्रह्म तदेव हि वरानने ।।
शिवनामस्वरूपेण व्यक्तं ब्रह्माहमेव हि ।
शिवनामाहमेवेति विजानीहि यथार्थत: ।।
यद्व्यक्तं परम् ब्रह्म वेदान्तप्रतिपादितम् ।
तदेवेदं विजानीहि शिव इत्यक्षरद्वयम् ।।
तारकं ब्रह्म परमं शिव इत्यक्षरद्वयम् ।
नैतसमादपरं किञ्चित तारकं ब्रह्म सर्वथा ।।
अर्थात् हे ! वरानने, मेरा ‘शिव’ यह नाम सर्वोत्तम है, वही परब्रह्म है, ‘शिव’ यह नाम मुझ ब्रह्मकी अभिव्यक्ति है, शिवनामसे यथार्थमें मुझे ही समझो । जो वेदान्तसे प्रतिपादित अव्यक्त ब्रह्म है, द्वैक्षर शिव भी वही है । दो अक्षरोंका यह शिवनाम परब्रह्म स्वरूप एवं तारक है, इससे भिन्न कोई तारक नहीं ।
२. भगवान् श्रीकृष्णद्वारा शिवके नामकी स्तुति
ब्रह्मवैवर्त पुराणके ब्रह्म खण्डमें भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, “महादेव, महादेव कहनेवालोंके पीछे मैं नाम श्रवणके लोभसे अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ जाता हूं । जो ‘शिव’ शब्दका उच्चारणकर प्राणोंका त्याग करता है, वह कोटि जन्मोंके पापोंसे छूटकर मुक्तिको प्राप्त करता है । ‘शिव’ शब्द कल्याणवाची है और ‘कल्याण’ शब्द मुक्तिवाचक है । वह मुक्ति भगवान शंकरसे ही प्राप्त होती है; इसीलिए वे शिव कहलाते हैं । धन तथा बान्धवोंके नाश हो जानेके कारण शोक सागरमें मग्न हुआ मनुष्य, शिव शब्दका उच्चारणकर सब प्रकारके कल्याणको प्राप्त करता है ।”
शिव शब्दमें ‘शि’ का अर्थ पापोंका नाश करनेवाला एवं ‘व’ मुक्ति देनेवाला है । भगवान शंकरमें ये दोनों गुण हैं; इसीलिए वे शिव कहलाते हैं । ‘शिव’ यह मंगलमय नाम जिसकी वाणीमें रहता है, उसके कोटि जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं ।
३. शिव नाम है मंगलकारी
शि’ का अर्थ है, मंगल एवं ‘व’ दाताका द्योतक है; इसीलिए जो मंगलदाता है, वही शिव है ।
४. शिव नाम है कल्याणकारी
भगवान शिव विश्वभरके मनुष्योंका सदा ‘शं’ अर्थात कल्याण करते हैं एवं कल्याण मोक्षको कहते हैं । इसीसे वे शंकर कहलाते हैं ।
५. शिव हैं देवोंके देव, महादेव
ब्रह्मादि देवता या जो कोई भी, इस संसारमें महान कहलाते हैं, उन सबके देव अर्थात उपास्य होनेसे, वे महादेव कहे जाते हैं ।
६. प्रकृति स्वरूपी जगदम्बाद्वारा पूजित हैं शिव
उसीप्रकार विश्वभरमें पूजित जो मूल प्रकृति ईश्वरी है उस प्रकृतिद्वारा पूजित देव महादेव कहलाते हैं।
७. सभी आत्माओंमें व्याप्त हैं शिवरूपी महेश्वर
संसारमें स्थित सारी आत्माओंके ईश्वर अर्थात् स्वामी होनेसे वे महेश्वर हैं ।
८. मृत्युकालमें किसी भी प्रकारसे लिया गया ‘शिव’ नाम देता हैं परम पद
पद्मपुराणके पाताल खण्डमें शिव-मृत्यु संवादमें शिवजीने मृत्युको देखकर कहा, “इसने मरणकालमें मेरा नाम लिया है, मुझे लक्ष्यकर अथवा और किसी वस्तुके अभिप्रायसे जो मेरा नाम एकाध अक्षर जोडकर अथवा घटाकर भी कहता है, उसे मैं अपना लोक प्रदान करता हूं । इसने मरते समय ‘प्रहर’ शब्दका उच्चारण किया है । केवल ‘हर’ शब्द ही परमपद देनेवाला है एवं इसने तो ‘प्र’ शब्द अधिक कहा है, यमराजसे मेरा आदेश कह दो कि जो शिवके नाम जपनेवाले हैं, उन्हें तुम नमस्कार किया करो । जो लोग शिवको नमस्कार करते हैं, उनकी पूजा करते हैं, उनके नाम और गुणका कीर्तन करते हैं, उनकी उपासना करते हैं अथवा दास्य भावसे उनकी भक्ति करते हैं, श्रुतिमें वर्णित पञ्चाक्षर मन्त्र ‘नमः शिवाय’का जप करते हैं तथा शतरुद्रीयका अनुष्ठान करते हैं, उनपर मेरा ही शासन है, इसमें तनिक भी सन्देह न करना ।”
९. शिवनामका जप करनेवालेका पुनर्जन्म नहीं होता
उसीप्रकार शिवरहस्यके सप्तमांशके प्रथम अध्यायमें भगवान शिव कहते हैं, “जो गति योगियों और काशीमें शरीर छोडनेवालोंकी होती है, वही गति मेरे नामका कीर्तन करनेवालोंको प्राप्त होती है । जो मनुष्य मेरे मुक्तिदायक महेश, पिनाकपाणी, शम्भू, गिरीश, हर, शंकर, चन्द्रमौली, विश्वेश्वर, अन्धाकरिपू, पुर्सूदन इत्यादि नामोंका उच्चारण करते हुए मेरी अर्चना करते हैं, वे धन्य हैं । जो नीललोहित, दिगम्बर, कृतिवास, श्रीकण्ठ, शान्त, नीरुपाधिक, निर्विकार, मृत्युंजय, अवयव, निधीश, गणेश्वर इत्यादि नामोंका उच्चारण करते हुए मेरी पूजा करते हैं, वे धन्य हैं । मेरे नामरूपी अमृतका पान करनेवाले, निरन्तर मेरे चरणोंका पूजन करनेवाले तथा मेरे लिंगोंका पूजन करनेवाले मेरे प्रिय भक्त, पुनः माताका दूध पीनेकी न तो इच्छा रखते हैं और न ही उन्हें वह पुनः प्राप्त होता है, अर्थात उनका पुनर्जन्म नहीं होता । वे तो सारे दु:खोंसे छूटकर मेरे लोकमें अनन्तकालतक निवास करते हैं । महेशरूपी नामकी दिव्य अमृतधारासे परिप्लावित मार्गसे होकर जो भी निकल जाते हैं, वे कदापि शोकको प्राप्त नहीं होते ।”
१०. शिव नाम है पापोंका क्षालन करनेवाला
शिवपुराणमें भगवान शिव स्वयं यमराजसे कहते हैं, “जो पुरुष प्रसंगवश भी मेरा नाम उत्साहपूर्वक रटेगा, वह सर्वथा पापोंसे छूट जाएगा इसमें कोई सन्देह नहीं । हे ! यमराज मेरा नाम पापोंके वनोंको जलानेमें दावानल समान है । मेरे एक नामका उच्चारण करते ही पापोंका समूह नष्ट हो जाता है । मेरे नामका श्रद्धापूर्वक स्मरण करनेपर पाप कैसे ठहर सकता है ?; क्योंकि पापोंके झुण्डका नाश करनेमें तो उसी वज्रपातकी उपमा दी गई है । जिसप्रकार कालाग्निकी ज्वालाओंमें कोटि पर्वत जल गए थे, उसीप्रकार मेरी नामरूपी अग्निसे कोटि महापातक नष्ट हो जाते हैं । मैं उस चाण्डालको भी निःसन्देह घोर संसार समुद्रसे तार देता हूं, जिसका चित्त मेरे नामस्मरणमें मग्न रहता है ।
११. शिव नाम है अमृत समान
शिवपुराण ग्रन्थमें ब्रह्माजी महर्षि गौतमसे कहते हैं, “शिव नामरूपी मणि जिसके कण्ठमें सदा विराजमान रहती है वह नीलकण्ठका ही स्वरूप बन जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं । हे ! द्विजवर, तुम नित्य शंकरका पूजन करो और शिव नामामृतका पान करो । शिव नामसे बढकर दूसरा कोई अमृत नहीं है । मृत्युके समय शिवके ये दो अक्षर भगवान शंकरकी कृपाके बिना मनुष्यके होठोंपर नहीं आते ।”
१२. शिव नाम है गायत्री समान पवित्र और श्रेष्ठ
इसी ग्रन्थमें यमराज भी गौतम महर्षिसे कहते हैं, “महानसे महान पापी भी अथवा जिसने जीवनमें कोई भी पाप करना न छोडा हो, वह अन्तकालमें यदि शिवका नाम उच्चारणकर ले तो वह पुनः मेरा द्वार नहीं देख सकता । शिव शब्दका उच्चारण किए बिना ब्राह्मण भी मुक्त नहीं हो सकता और शिव शब्दका उच्चारणकर चाण्डाल भी मुक्त हो सकता है । वैसे तो शिवजीके सभी नाम मोक्षदायक हैं; किन्तु उन सबमें ‘शिव’ नाम सर्वश्रेष्ठ है, उसका महात्म्य गायत्री समान है ।”
१३. शिवके नामका अपमान करनेवालोंका होता है अमंगल
श्रीमद्भागवतमें भगवतीका एक वाक्य इसप्रकार है, ‘शिव इस द्वै अक्षर नामका एकबार प्रसंगवश उच्चारण करनेसे भी मनुष्यके पाप शीघ्र नष्ट हो जाते हैं । आश्चर्य है कि आप उन पुण्यश्लोक अलंघ्यशासन भगवान शिवका विरोध करते हैं, इससे बढकर अमंगल क्या हो सकता है ?”
१४. शिवनामसे मुक्ति निश्चित
सौरपुराणके सातवें अध्यायमें लिखा है, “जो मनुष्य प्रसंगवश, कौतुहलसे, लोभसे, भयसे अथवा अज्ञानसे हर नामका उच्चारण करता है, वह सर्व पापोंसे छूट जाता है ।” उसी ग्रन्थके चौथे अध्यायमें लिखा है, “जो मनुष्य ज्ञानपूर्वक भगवान शम्भूके नामोंका कीर्तन करता है, उसकी मुक्ति निश्चित है ।” उसी ग्रन्थके चौंसठवें अध्यायमें लिखा है, “जो बिल्ववृक्षके नीचे बैठकर तीन रात उपोषित रहकर पवित्रतापूर्वक शिवनामका एक लाख जप करता है, वह भ्रूण हत्याके पापसे छूट जाता है । जितने भी स्थूल अथवा सूक्ष्म पाप हैं, वे सारेके सारे शिवका चिन्तन करनेसे तुरन्त नष्ट हो जाते हैं ।”
१५. शिव नामका जप करनेवालेका मुखदर्शनसे तीर्थ समान लाभ प्राप्त होना
शिवपुराणमें यह भी कहा गया है कि ‘नमः शिवाय’ जो इस मन्त्रका उच्चारण करता है उसका मुख देखनेसे निश्चय ही तीर्थ दर्शनका लाभ प्राप्त होता है । जिसके मुखमें शिवनाम तथा शरीरपर भस्म और रुद्राक्ष रहता है, उसके दर्शनसे ही पाप नष्ट हो जाते हैं ।
उ. कूर्मपुराण अनुसार कलयुगमें शिवनाम सब नामोंसे बढकर है –
ब्रह्म कृतयुगे देवस्त्रेतायां भग्वान् रवि ।
द्वापरे दैवतम् विष्णु: कलौ देवो महेश्वर: ।।
ऊ. वस्तुतः शिवनामके स्मरणसे कर्मोंकी न्यूनता पूर्ण हो जाती है
इसलिए कहा गया है –
यत्पादपद्मस्मरणाद्यच्छ्रीनामजपादपि ।
न्यूनं कर्म भवेत् पूर्णं तं वन्दे साम्बमीश्वरम् ।।
ए. शिव नामका गुणगान करना सम्भव नहीं
शिव नामकी महिमा कहां तक कही जाए ।
आचर्य पुष्पदन्तने अपने शिवमहिम्न: स्तोत्रमें कहा है –
असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिन्धु-पात्रे ।
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं ।
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ।।
अर्थात् यदि मषीके (स्याहीके) लिए काजलका एक पहाड हो और समुद्रकी मषीपात्रमें उसे भरकर रखा जाए, कल्पवृक्षकी टहनियोंकी लेखनी बनाई जाए और पृथ्वीको कागद बनाकर भगवती सरस्वती अनन्तकालतक लिखती रहे तब भी हे प्रभो ! आपके गुणोंका अन्त नहीं आ सकता । अब जब भला माता सरस्वती ही भगवानके गुणोंका वर्णन करनेमें असमर्थ है तब दूसरा कोई इस कार्यको कैसेकर सकता है ? अतः हम सामान्य मनुष्य तो मात्र शिव नामका स्मरण कर सकते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करनेका प्रयास कर सकते हैं । यथार्थमें शिवके नामपर विश्वास करनेवाले मनुष्यको इसके प्रमाणकी भी आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि जिसने भी शुद्ध अन्तःकरणसे शिवका नाम लिया है उसने परमपदको अवश्य ही प्राप्त किया है | – तनुजा ठाकुर
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