मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर
यत्पूजितं मयादेव परिपूर्णं तदस्तु मे ।
अपराध सहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया
दासोऽयं इति मां मत्वा क्षमस्व पुरुषोत्तम ।।
अर्थ : हे देवाधिदेव ! न मन्त्रोंका उच्चारण आता है, न योग्य प्रकारसे कर्मकांडकी कृति(क्रिया) ही कर पाता हूं, न ही भक्ति है, हे प्रभु जब भी मैं आपकी पूजा करूं, आप ही मुझे योग्य दिशा देकर मुझे परिपूर्ण करें । हे पुरुषोत्तम, दिवस और रात्रि मेरेद्वारा सहश्रों चूक हो जाते हैं तब भी इस दासको क्षमा करें, हम आपके शरणागत हैं !
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