साधनाका मूल उद्देश्य होता है त्रिगुणातीत होकर उस निर्गुण निरकार ईश्वरसे एकरूप होना । त्रिगुणातीत होने हेतु आरम्भमें अपने सत्त्व गुणको बढाना एवं रज-तम गुणोंको न्यून (कम) करना अत्यन्त आवश्यक होता है । हमारे स्वभाव दोष वस्तुत: हमारे भीतर रज-तमके संस्कारोंका प्रकटीकरण होते है; ईश्वरप्राप्ति हेतु इच्छुक साधकोंने इस प्रक्रियाको नियमित एवं प्रमाणिकताके साथ करनेका प्रयास करना चाहिए । स्वाभावदोष जितने न्यून होंगे, दिव्य गुण उतने ही अधिक होंगे और गुणोंका होना साधनामें पोषक सिद्ध होता है । दोष दूर होना अर्थात उसके स्थानपर गुणका आ जाना जैसे मिथ्या (झूठ) बोलना, यह दोष है तो यह दोष दूर होनेपर सत्य बोलना यह गुण स्वतः ही अंगीकृत हो जाता है । (२६.९.२०१७)
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