शुभकामना पत्र देनेकी अपेक्षा मुहंसे बोलकर शुभकामनाएं दें, उससे शुभकामनाएं फलित भी होती हैं और प्रेम भी बढता है । शुभकामना पत्रका प्रचलन पाश्चात्योंने आरम्भ किया है और आज भी इसी माध्यमसे हमारे देशसे अनेक विदेशी प्रतिष्ठान अनेक कोटि रुपए लूटकर ले जाते हैं । हमारी वैदिक संस्कृतिके व्रत-त्योहार, प्रेम और सौहार्दका सन्देश देती हैं, यहां आडम्बर या दिखावाके लिए स्थान नहीं था; इसलिए आज भी छोटे नगरोंमें होली मिलन, दीपावली मिलनका कार्यक्रम होता है । साथ ही दशहरा, दीपावली एवं होली इत्यादि त्योहारोंपर हम अपने परिजनोंसे मिलते हैं, हमसे आयुमें जो बडे है, उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं एवं छोटोंको स्नेह देकर शुभाशीष देते हैं, क्या यही अपनापन एक कागदका टुकडा रुपी सन्देश दे सकता है ?
आजकल महानगरोंमें लोग अपने पडोसी तकसे सीधी बात नहीं करते हैं, अपनेआपमें सीमित रहनेके कारण वे अत्यधिक एकाकी और तनावग्रस्त रहते हैं, ऐसे लोगोंको अपने घरमें बिना आमंत्रणके यदि उनके कोई सम्बन्धी भी आ जाए तो उनका मुख लटक जाता है, ऐसे कालमें शुभकामना पत्रका प्रचलन और भी सम्बन्धोंमें दूरी और खटाश लाता है और व्यक्तियोंमें प्रेमको घटाता है । मनुष्य स्वाभावसे एक सामाजिक प्राणी है; अतः जब अपे इस मूल स्वाभावके विपरीत उसका आचरण होने लगता है तो उसका दुखी रहना स्वाभाविक है | मैंने अनेक घरोंमें या व्यावसायिक प्रतिष्ठानोंमें देखा है कि दीपवालीमें आनेवाले अनेक शुभकामना पत्रको वे बिना खोले, दीपावलीके पश्चात् कबाडीको विक्रय कर देते हैं ।
ईश्वरने मुझे ग्रामीण क्षेत्रोंमें रहनेका सौभाग्य दिया है और यद्यपि धर्मका क्षरण, वहां भी हुआ है किन्तु वहां आज भी एक गांव, एक कुटुंब समान होता है । प्रथम क्रूर मुगलोंने हमारी वैदिक संस्कृतिका क्षरण किया और जो शेष रह गया था उसका सत्यानाश अंग्रेजोंने कर दिया; अतः समय आ गया है कि हम अपनी वैदिक संस्कृतिके प्रत्येक अंगको पुनर्जीवित करें ।
इस दीपावली सभीसे मिलकर मुखसे बोलकर दीपावलीकी शुभकामनाएं दें ! – पू. तनुजा ठाकुर (१२.१०.२०१७)
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