अन्नोंपर संस्कार करके, उसे ग्रहण करनेकी शिक्षा देनेवाला हिन्दू धर्म !
हिन्दू धर्ममें अन्नकी शुचितापर विशेष ध्यान दिया जाता था । आदिकालसे अन्नको उत्पन्न करनेकी कृतिसे लेकर उसे भोजनके रूपमें ग्रहण करनेतक अन्नके ऊपर अनेक संस्कार किए जाते थे, तभी तन और मन दोनों ही पवित्र रहते थे और यह साधनाके लिए पोषक तो था ही, इससे शरीर और मन दोनों ही स्वस्थ रहते थे । मृत्युके या शिशुके जन्मके पश्चात, स्त्रीके रजस्वला होनेके पश्चात भी कुछ दिन अन्न पकाते समय विशेष नियमोंका पालन किया जाता था; परन्तु आज पैशाचिक पाश्चात्य संस्कृतिके अन्धानुकरणने अन्नको मात्र जिह्वाके स्वाद या शरीरके पोषणका एक माध्यम बना दिया है । साम्प्रत कालमें अन्नसे सम्बन्धित सारे संस्कारोंकी उपेक्षा की जाती है और दूषित अन्न ग्रहण करनेके कारण अनेक प्रकारके रोगसे हम ग्रसित हो जाते हैं; अतः वैदिक संस्कारोंको पुनः आत्मसात करनेकी आवश्यकता है । विशेषकर घरकी स्त्रियां प्रात:काल स्नानादिकर, अन्नपूर्णा माताकी पूजाकर, नामजप करते हुए भोजन बनानेका प्रयास आरम्भ करें ।
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