विदेशमें रहनेवाले हिन्दुओंकी दु:स्थिति, कारण एवं निवारण (भाग – ६)


विदेशमें जाकर बसनेवाले अधिकांश हिन्दुओंमें अपने देशके प्रति प्रेम और निष्ठाकी कमी होती है, यह सुनकर विदेशमें रहनेवाले कुछ हिन्दुओंको दुःख होगा; किन्तु मैंने ऐसा पाया है कि जो संस्कार आपमें है वह आप अपनी सन्तानोंमें अवश्य डालेंगे; किन्तु यदि वह आपमें नहीं है तो वह आपकी सन्तानोंमें नहीं डाल सकते हैं, यह एक कटु सत्य है, जिसे सभीको स्वीकार करना ही होगा ! अधिकांश हिन्दू जो अधिक धन अर्जित करनेके लोभमें विदेश जाते हैं, वे भारतमें बार-बार आनेको धनको अनावश्यक अपव्यय मानते हैं । आजकल विदेशमें सब कुछ मिलता है; अतः विशिष्ट भोजन या वस्त्र इत्यादिके लिए अब भारत आनेकी आवश्यकता नहीं होती है, ऐसेमें अनेक हिन्दू तीन,पांच या सात वर्ष पश्चात भारत आते हैं, वह भी कुछ विशेष प्रयोजन हो तो ही आते हैं और जब वे आते हैं तो अपने बच्चोंको नहीं लाते हैं । ऐसेमें वे युवा होनेपर भारत स्वयंप्रेरित होकर आना नहीं चाहते हैं ।
 वैसे ही आज महानगरोंके वृद्धाश्रमोंमें रहनेवाले आश्रितोंके बच्चे विदेशमें उच्चे पदपर कार्यरत होते हैं; किन्तु क्या उनकी इस स्थिति हेतु क्या वे स्वयं भी उत्तरदायी नहीं है ? सिंगापुरमें उत्तर प्रदेशके रहनेवाले एक व्यक्तिको जो एक बहुराष्ट्रीय प्रतिष्ठानमें उच्च पदपर आसीन थे, उनसे एक दिवस वार्तालापके मध्य मैंने कहा कि भारतमें आपके वृद्ध माता-पिता अकेले रहते हैं तो आप वहां क्यों नहीं चले जाते हैं ? तो उन्होंने कहा, “मेरे पिताजी बचपनसे ही कहते थे, मैं चाहता हूं कि तुम इतनी ऊंचाईपर पहुंचो कि जब मैं गांवमें चलूं तो सब तुम्हारे विषयमें मुझसे पूछा करे कि वह कहां है और क्या कर रहा है ? आज गांवमें वे गर्वसे बताते हैं कि मेरा पुत्र सिंगापुरमें है और बहुत बडा अधिकारी है !” वे कहने लगे, “मुझे विदेश आनेकी इच्छा नहीं थी; मेरे पिताजीने एक धनाड्य किसान हैं, मेरी इच्छाके विरुद्ध मेरी पढाई-लिखाई यहीं करवाई और उसके पश्चात यहांके नियम अनुसार मुझे दो वर्ष चाकरी करनी पडी, अब जब पूरी युवावस्था यहीं बीती हो, तो गांवमें मेरा मन कैसे लगेगा ? मेरे माता-पिता, अपनी अति महत्त्वाकांक्षाका परिणाम भोग रहे हैं !” उनकी बातोंमें सत्यता भी थी और यह आज बहुतसे युवाओंके साथ हो रहा है !
जब माता-पिता अपने बच्चोंको नियमित भारत नहीं लाते हैं या उन्हें भारतकी अच्छाईयां नहीं बताते हैं तो ऐसेमें बच्चोंकी भारतसे आत्मीयता अल्प हो जाती है । अनेक हिन्दुओंके बच्चोंने मुझे बताया कि विदेश, भारतसे अच्छा कैसे है ? और वे अब पुनः भारत वापस नहीं आना चाहते हैं ! वे जिस देशमें रहते हैं, वे स्वयंको उसी देशका मानने लगते हैं, इससे हानि यह होती है कि वे धीरे-धीरे अहिन्दू संस्कार और संस्कृतिको अंगीकृत करने लगते हैं और अपने शाश्वत सनातन धर्मसे दूर चले जाते हैं ! उनकी अगली पीढी वहींके लोगोंसे विवाह कर लेती हैं और इसप्रकार ‘कुल-गोत्र-प्रवर’की श्रेष्ठ परम्पराका नाश होता है अर्थात कुलनाशकी ओर वह पीढी बढती है । जी हां, विदेशी पाश्चात्योंका कहां कुल और गोत्र होता है ? वस्तुत: सनातन धर्मावलम्बियोंने कभी भी अपने मूल स्थानका परित्याग नहीं करना चाहिए, इससे कुलदेवता कुपित होते हैं और उनके कुपित होनेसे असाध्य रोग, क्लेश एवं अन्य समस्याएं स्वतः ही निर्माण होने लगती हैं, मैंने बहुत ही प्रेम करनेवाले दम्पतियोंमें विदेश जाते ही सम्बन्ध विच्छेदकी घटना पाई है, यह अनेक बार कुलदेवता प्रकोपके कारण भी होता है । आज भी कोई भी पूजा विधि हो, हम अपने कुलदेवताकी आराधना अवश्य करते हैं । मैंने विदेशमें रहनेवाले हिन्दुओंके बच्चोंको जब भिन्न प्रकारके असाध्य कष्टोंका सूक्ष्म परिक्षण किया तो उसमें अनिष्ट शक्तियोंके कष्टके साथ ही कुलदेवताका प्रकोप भी पाया ! वस्तुतः प्रत्येक वर्ष अपने बच्चोंके साथ विदेशमें रह रहे हिन्दुओंने आकर, अपने गांवमें होनेवाले कुलाचारका पालन, कुलदेवताका दर्शन एवं कुलमें प्रचलित उपासना पद्धतिका पालन अवश्य करना चाहिए, इससे बच्चोंपर कुलदेवताकी कृपा रहती हैं जिससे उनका अनिष्ट शक्तियोंसे रक्षण होता है । उन्हें, इससे अपने कुटुम्बसे प्रेम निर्माण होता है, भारत देशकी सात्त्विकताका भान होता है । अच्छा देखनेपर ही बुरा क्या है, इसका भान होता है ! ऐसा धन किस उपयोगका जो आपके बच्चोंको भविष्यमें सुख-शान्ति और अपने देश और संस्कृतिके प्रति प्रेम न निर्माण कर सके ! पितृ कर्मका पालन विदेशमें कितना हो सकता है, इसकी आप इसी बातसे कल्पना करें कि वहां अधिकांश मन्दिर शनिवार और रविवारको खुलते हैं और पुजारी भी मन्दिरमें पूजाके अतिरिक्त ‘कहीं न कहीं’ चाकरी करते हैं ! इसपर विस्तारसे अन्य लेखमें बताउंगी !
 विदेशमें रहनेवाले अनेक हिन्दू स्वयं शाकाहारी होते हैं, किन्तु उनके बच्चे सुअर और गोमांसका प्रेम और अभिमानसे भक्षण करते हैं ! यूरोपमें एक ‘राधास्वामी सम्प्रदाय’को माननेवाले कुटुम्बसे मेरी भेंट हुई, वे अपने तीनों युवा पुत्रोंसे बहुत दु:खी थे, वे तीनों गोमांस भक्षण करते थे और जब उनके पिता ऐसा करनेसे मना करते थे तो वे अपने अनर्गल तर्कोंसे और दुःखी कर देते थे और वे निरुत्तर हो जाते थे और मेरे समक्ष तो वे रो रहे थे ! उनके पुत्र मुझसे मिलना भी नहीं चाहते थे !
अधिकांश बच्चे जब वहीं बढकर युवा हो जाते हैं तो वहांकी संस्कृति अनुसार बहुत ही स्वार्थी हो जाते हैं, वे अपनी बातोंसे अपने माता-पिताको सदैव व्यथित करते हैं ! कुछ विवाह नहीं करना चाहते हैं तो कुछ समलैंगिक हो जाते हैं, कुछ अल्पायुमें अर्थात १६ या १७ वर्ष में ही स्वयं ही घर छोडकर किसीके साथ लिव-इनमें (बिना विवाहके पति-पत्नी समान) रहने लगते हैं तो कुछ वहांके लोगोंसे विवाह कर लेते हैं ! इसप्रकार जब मैं विदेश गई तो वहां जाकर एक सीख लेकर आई, विदेश जाओ, पैसे कमाओ और बच्चे गंवाओ ! – तनुजा ठाकुर



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