केरलके दुष्कर्म करने वाले बिशपको सप्ताहके भीतर छोडने वाले न्याय तन्त्रने आसाराम बापूकी ‘पैरोल’ याचिका अस्वीकृत की !!


दिसम्बर २०, २०१८

आसाराम बापूको अभी जोधपुर केन्द्रीय कारावासमें ही रहना पडेगा । राजस्थान उच्च न्यायालयने बुधवारको आसारामके भांजेद्वारा लगाई गई ‘पैरोल’ याचिका अस्वीकृत कर दी । राजस्थान उच्च न्यायालयके न्यायाधीश संदीप मेहता और विनीत माथुरकी खण्डपीठने सुनवाईके पश्चात आसारामके भुगतान रजिस्टरपर (पैरोलपर) हस्तक्षेप करनेसे मना कर दिया ।


यद्यपि आसाराम बापूके अधिवक्ताके अनुरोधपर पुनः जनपद पैरोल समितिके समक्ष आवेदन करनेकी छूट दी है । रमेश भाईकी ओरसे याचिकामें कहा गया था कि आसारामको कारावासमें पांच वर्षसे भी अधिक हो गए हैं और उसका आचरण भी सन्तोषजनक है । चौथाई दण्ड पूरा करनेके पश्चात प्रथम पेरोलपर आसाराम बापूका अधिकार है ।

शासनद्वारा प्रस्तुत उत्तरमें कहा गया था कि प्रथम पेरोल आसारामका अधिकार है, परन्तु मृत्यु तक कारावासमें रहनेका दण्ड भोग रहे आसाराम बापूके शेष प्राकृतिक जीवनकी गणना नहीं की जा सकती । इस कारण पांच वर्षके कारावासको चौथाई दण्ड काटना नहीं कहा जा सकता ।

आसाराम तीन अन्य प्रकरणोंमें भी वांछित है । राज्य शासनद्वारा मांगी गई विधिक परामर्शमें महानिदेशक कारागारने आसारामको ‘पेरोल’ देनेसे मना कर दिया है । इससे पूर्व ‘पेरोल समिति’द्वारा आसारामके लिए मांगी गई बीस दिवसकी पैरोल याचिकाको अस्वीकृत कर दिया गया था ।

 

“दुष्कर्म करने वाले बिशपको न्यायालयद्वारा एक सप्ताहमें छोड दिया जाता है और हिन्दू साधुओंको पांच वर्षों पश्चात भी छोडनेसे मना कर दिया जाता है । यही इस तथाकथित हिन्दू द्रोही लोकतन्त्र व न्यायपालिकाका कटु सत्य है ! इससे पूर्व भी हिन्दू सन्तोंको ही प्रताडित किया जाता रहा है, इस परिस्थितिको परिवर्तित करने हेतु हिन्दू राष्ट्रकी आवश्यकता है ।”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : अमर उजाला



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