मांसाहारसे जुडा हुआ प्रत्येक कृत्य पाप कर्म निर्माण करता है, महाभारतमें भी कहा गया है –
धनेन क्रयिको हन्ति खादकश्चोपभोगतः।
घातको वधबन्धाभ्यामित्येष त्रिविधो वधः ॥
आहर्ता चानुमन्ता च विशस्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्ता चोपभोक्ता च खादकाः सर्व एव ते ॥ (महा० अनु० ११५:४०, ४९)
अर्थ : ‘मांस क्रय करनेवाला धनसे प्राणीकी हिंसा करता है, खानेवाला उपभोगसे करता है और मारनेवाला मारकर और बांधकर हिंसा करता है, ये तीनों प्रकार ‘वध’ ही हैं । जो मनुष्य मांस लाता है, जो अनुमति देता है या मंगाता है, जो पशुके अंग काटता है, जो क्रय या विक्रय करता है, जो पकाता है और जो खाता है, वे सभी मांस खानेवाले हत्यारे हैं ।’
हिन्दू धर्म सत्त्व गुणको वृद्धिंगत करनेका शास्त्र बताता है, ‘मांस’ पशुके वधसे प्राप्त आहार होता है; इसलिए वह तमोगुणी होता है, तमोगुणके बढनेसे सत्त्वगुणका ह्रास होता है और यदि मनुष्य योग्य प्रकारसे साधना नहीं करता है और तमोगुणी कृत्यको करते रहता है तो तमोगुणके प्रमाणमें वृद्धि होनेसे भय, आलस्य, प्रमाद, क्रोध इत्यादि दुर्गुणोंमें वृद्धि होती है, जो मनुष्यको कालान्तरमें आसुरी मार्गकी ओर प्रवृत्त करती है !
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