सृष्टिकी कर्मप्रधानता!


यह सृष्टि कर्मप्रधान है, यहां चींटीसे लेकर प्रगत मनुष्यतकको अपने कर्म करने पडते हैं, कर्मके बिना यहां कुछ साध्य नहीं हो सकता है, यहांतक कि यदि भाग्यमें कुछ हो तो उसे पानेके लिए भी कर्म तो करना ही पडता है; इसलिए कहा गया है :

यथा हि एकेन चक्रेण  न रथस्य गतिर्भवेत्।

एवं पुरूषकारेण विना दैवं न सिध्यति/सिद्ध्यति ॥

अर्थात जिस प्रकार एक पहिएवाले रथकी गति सम्भव नहीं है, उसी प्रकार बिना कर्मके बिना भाग्यसे कार्य सिद्ध नहीं होते हैं । जैसे विद्युत पंखा चल जाए तो वह हवा देती है; किन्तु वह चले, इस हेतु उसमें बिजलीके संचार करनेके लिए स्विच दबानेका कर्म तो करना ही पडता है ! वैसे ही प्रारब्धसे कार्य सिद्धि हेतु भी कर्म करना ही पडता है !

अर्थात मनमें यश पानेकी इच्छा हो और भाग्यमें भी यशप्राप्ति लिखा हो; किन्तु मनुष्य योग्य उद्यम न करे तो वह कैसे प्राप्त हो सकता है ? जैसे –

उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥

उद्यमसे (श्रमसे) ही कार्य सिद्ध होते हैं, न कि मात्र इच्छा करनेसे (मनोरथोंसे) । सोये हुए सिंहके मुखमें स्वयं मृग (आकर) प्रवेश नहीं करते, वैसे ही कर्म तो मनुष्यके जीवनका आधार है !

वस्तुत: कर्मठ मनुष्यके लिए कुछ भी असाध्य नहीं होता और आलसी मनुष्य कभी यशका पात्र नहीं बनता !



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