हमारा रसोईघर एक आयुर्वेदिक तत्त्वज्ञानसे भरपूर शोधशाला है (भाग – १)
आजकल अधिकांश स्त्रियां मात्र पेट भरने हेतु भोजन बनाती हैं ! वस्तुत: पाक कला यह अन्य कलाओं समान एक प्रगत कला है जिसका धर्मग्लानि होनेके कारण ह्रास हो गया है ! आजकलके स्त्रियोंको भोजन पकाते देखकर मुझे ऐसा लगता है जैसे वे उस सबसे महत्त्वपूर्ण कार्यको मात्र निपटानेके भावसे करती हैं और उससे मुक्त होना चाहती हैं परिणामस्वरुप आजकी युवा पीढीमें विशेषकर युवतियोंमें इस कलाके प्रति रुझान नाममात्रका है !
अनेक बार जब मैं पूछती हूं कि क्या आपने अपने बच्चोंको यह कला सिखाई है तो वे कहते हैं कि विवाह होगा तो वे सीख लेंगी ! किन्तु अब कच्ची आयुमें युवतियोंका विवाह तो होता नहीं है एक बार उनमें भोजन न बनानेका संस्कार आ जाये तो वे विवाहके पश्चात भी उसमें रुचि नहीं लेती हैं ! आजके होटल संस्कृतिका प्रचलनने इस वृत्तिको और बढावा दिया है या ऐसा कह सकते हैं भोजन बनानेकी कला न आनेके अक्करण तमोगुणी होटलमें जाकर खानेका प्रचलन बढ़ गया है !
वस्तुत: हमारा रसोईघर आयुर्वेदकी एक शोधशाला है उस ज्ञानसे अपनी सन्तानोंको वंचित रखना आर्थात एक शास्त्रसे उन्हें विमुख रखना है !
हमारा रसोईघर एक शोधशाला कैसे है इसके कुछ उदाहरण आगे आनेवाले लेखोंमें देने हेतु इस श्रृंखला आरम्भ कर रही हूं !
जब हम भिण्डीकी तरकारी बनाते हैं तो उसमें अजवायनकी छौंक लगाते हैं, इससे वह सुपाच्य होता है एवं वात भी नहीं करता है; किन्तु आजकी अधिकांश स्त्रियोंको यह तथ्य ज्ञात नहीं है !
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