शास्त्र वचन


न  हीदृशं  संवननं  त्रिषु  लोकेषु  वर्तते  ।
दया मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक ॥ 
अर्थ : प्राणियोंके प्रति दया, सौहार्द, दानकर्म एवं मधुर वाणीके व्यवहारके जैसा कोई वशीकरणका साधन तीनों लोकोंमें नहीं है ।


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