पूर्व पतिसे सम्बन्ध विच्छेदके बिना, मुस्लिम महिला नहीं कर सकती दूसरा विवाह, पंजाब न्यायालयने दिया निर्णय
११ फरवरी, २०२१
पंजाबके न्यायालयने एक नव-युगलके विवाहके विरुद्ध विरुद्ध नया निर्णय दिया है । अलका सरीन स्वयं स्त्री न्यायाधीश है । उसने एक मुसलमान महिलाके नवविवाहको अवैध बताया है और किसी प्रकारकी न्यायिक सुरक्षा देनेसे मना कर दिया है ।
नवयुगलने विवाह कर लिया है और उनके परिजनने उन्हें मार देनेकी और सम्पत्तियोंसे वंचित करनेकी धमकियां दी हैं । न्याय मांगनेपर, न्यायालयने उनके नए विवाहको अवैध ठहराया और निर्णय दिया कि पूर्व पतिसे सम्बन्ध विच्छेद हुए बिना, मुसलमान महिला दूसरा विवाह करनेकी अधिकारी नहीं है, जबकि मसलमान पुरुष बिना सम्बन्ध विच्छेदके दूसरा विवाह कर सकता है । यह स्वतन्त्रताके पूर्वका १९३९ का अधिनियम है, जिसके अनुसार महिलाको पूर्व पतिसे ‘तलाक’ लेना अनिवार्य है ।
महिलाने आरोप लगाया कि कि उसका पहला विवाह, उसकी इच्छाके विरुद्ध कर दिया गया था, इसलिए वह अब अपने प्रेमीसे विवाह करने जा रही है । न्यायालयने दूसरे विवाहके आधारपर सुरक्षाकी मांगको अवैध बताया और उन्हें जनपदके पुलिस अधीक्षकसे सुरक्षा मांगनेका परामर्श दिया । न्यायालयके अनुसार जीवनमें सङ्कट हो तो सुरक्षा देनेके लिए पुलिस बाध्य है ।
भारतमें अब भी दासता युगके अधिनियमोंका पालन, काले अंग्रेजोंद्वारा किया जा रहा है । मुसलमान स्त्रियां अपने ही समुदायमें दासताकी प्रतीक हैं; जबकि मुसलमान पुरुषोंके लिए संविधानका कोई अर्थ नहीं है । स्वतन्त्र भारतमें ही अपने नागरिकोंके लिए, न्यायालय जातिवाद सिद्ध करते हुए हिन्दुओं और मुसलमानोंमें भेदभाव करता है । ऐसे अधिनियमोंको निरस्त करनेके लिए हिन्दूराष्ट्रकी ही आवश्यकता है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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