अध्यात्ममें एकाकी नहीं आनन्दवस्था होती है


देहलीकी एक परिचित स्त्रीने मुझसे कहा, “मैंने युवावस्थामें विवाह इत्यादिको महत्त्व न देकर मात्र अपनी चाकरीमें पदोन्नति हेतु प्रयत्नरत रही और आज मेरी उपलब्धियोंपर मुझे और मेरे शुभचिन्तकोंको गर्व है; किन्तु आज मैं स्वयंको अनेक बार अत्यन्त एकाकी पाती हूं, जिससे मैं अवसादग्रस्त हो जाती हूं ।” उन्होंने मुझसे पूछा, “क्या अध्यात्ममें सबकुछ छोडकर आनेपर आपको भी ऐसा अनुभव होता है ?” मैंने कहा, “व्यवहार और अध्यात्ममें यही अन्तर है, अध्यात्ममें साधक जितनी अधिक ऊंचाईको प्राप्त करता है, मनमें आनन्द, शान्ति और सन्तुष्टिका भाव उतना ही अधिक जागृत रहता है और मन एकाकी रहनेपर ईश्वरीय अनुसन्धानमें होनेसे परम शान्तिकी अनुभूति होती है ! हां, यह अवश्य हो सकता है कि जीवदशामें आकर समष्टि कार्य करते समय विकारयुक्त, विषयासक्त मनुष्योंके मध्य रहनेसे मन, कुछ कालके लिए थोडा खिन्न हो सकता है; किन्तु पुनः ईश्वरीय अनुसन्धानमें जानेसे मन आनन्दी हो जाता है । अध्यात्मिक प्रगति होनेपर मनोलय और बुद्धिलय हो जाता है; अतः मन होता ही नहीं, इसलिए अवसादग्रस्त होनेका कोई प्रश्न नहीं उठता, अन्यथा एकांतमें रहनेवाले ऋषि, मुनि, तपस्वी सभी अवसादग्रस्त हो जाते ! अध्यात्मिक प्रगति होनेपर शब्दातीत परब्रह्मकी अनुभूतिके पश्चात जीवदशामें उतरकर समष्टि उद्धार हेतु समष्टि कार्य करना थोडा कठिन होता है; अर्थात समाजभिमुख होना कठिन हो जाता है; किन्तु उन्नत, सन्त या गुरु ईश्वरके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु ऐसा करते हैं ।



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