आजके निधर्मी नेतागण व पूर्वकालके धार्मिक वृत्तिके राजाओंमें अन्तर !


 पूर्वकालमें राजा-महाराजा भव्य मन्दिरोंका निर्माण कराकर, उनका अनुरक्षण (रखरखाव) राजकीय कोषसे करते थे और आज ही मुझे ज्ञात हुआ कि दक्षिण भारतके कुछ राज्योंके, प्राचीन मन्दिरोंकी वे देखभाल करते हैं एवं उन मन्दिरोंके न्यासके वे विश्वस्त (ट्रस्टी) हैं । आजके राज्यकर्ता मन्दिर क्या निर्माण कराएंगे, विकासके नामपर सम्पूर्ण भारतमें अनेक मन्दिरोंको ‘बुलडोजर’से उन्होंने ध्वस्त किया है । और राज्य व केन्द्रकी ओरसे दान तो मात्र अल्पसंख्यकोंकी मस्जिदों और गिरिजाघरोंको ही मिलता है । पूर्व कालके राजा अपने दरबारमें ब्राह्मणों व अध्यात्मविदोंको उच्च पद देकर उनका मान-सम्मान करते थे और पुरोहितोंके जीविकोपार्जनकी व्यवस्था करते थे; किन्तु इस तथाकथित धर्मनिरपेक्षताके कारण आज भारतमें पादरी और मुल्ला-मौलिवियोंको तो मानदेय दिया जाता है, हिन्दू पुरोहित वर्ग वैसे ही उपेक्षित रहता है ।
      आज इस कोरोना महामारीके कारण जब भक्तोंका आवागमन मन्दिरोंमें नहीं हो रहा है तब भी हिंदुत्वका पक्ष लेनेवाले (ऐसा लोग कहते हैं) भाजपा शासनने पुरोहितोंके विषयमें अंशमात्र भी विचार नहीं किया; इसलिए हिन्दू राष्ट्र चाहिए !


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