आश्रममें रहनेका महत्त्व (भाग – २ )  


आश्रम कर्मयोगकी शिक्षा देनेवाला एक प्रत्यक्ष स्थल – आश्रममें रह रहे सन्तसे लेकर साधकतक सभी निष्काम भावसे कर्मरत दिखाई देते हैं । इतना ही नहीं, वे यह सब कर्म ईश्वरको कर्तापन अर्पण कर करते हैं; अतः आश्रममें कर्मरत सन्त एवं साधकके मुखपर दैवी कर्मका तेज स्पष्ट परिलक्षित होता है; अतः यदि आलस्यका त्याग करना हो तो इस कर्मक्षेत्रमें कुछ दिवस रहकर, सांसारिक व्यक्तियोंने अवश्य ही सेवा करनी चाहिए ! कृतिसे ही प्रवृत्ति निर्माण होती है; अतः यदि तत्परतासे आलस्यका त्याग कर कर्म किया जाए तो थोडे समयमें आलस्यका दुर्गुण स्वतः ही दूर हो जाता है एवं स्फूर्ति और नियोजनबद्ध रीतिसे निष्काम कर्म करनेका संस्कार निर्माण होता है ।   



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