कुछ लोग सन्तोंके आश्रमके अन्नको बासी(एक रात्रि पूर्व बना हुआ खाद्य पदार्थ) कहकर नहीं खाते हैं । सन्तोंके आश्रमका अन्न भिक्षामें (दानमें) प्राप्त होता है; इसलिए वह अन्न प्रसाद स्वरूप होता है । बासी अन्न तमोगुणी होता है; अतः सामान्य घरोंमें जो अन्न रात्रिमें रखा रहता है, वह बासी कहलाता है । सामान्य गृहस्थोंके घरकी तुलनामें सन्तोंके आश्रममें तमोगुणका प्रमाण नगण्य होता है | वस्तुतः जहां त्रिगुणातीत सन्तोंका स्थूल एवं सूक्ष्म अस्तित्व होता है, वहांके अन्नको ग्रहण करनेके लिए तो देवलोकके देवता भी लालायित रहते हैं, ऐसा अन्न बासी कैसे हो सकता है ?; किन्तु अज्ञानताके कारण आज अनेक लोग ऐसी बातें करते हैं ।
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