आश्रमका महत्त्व (भाग – १३)


आश्रममें हमारी प्रवृत्ति अनुरूप भिन्न योगमार्गसे साधना करना है सम्भव : आश्रममें रहकर हम हमारी प्रवृत्ति अनुरूप योग्य मार्गदर्शनमें विशिष्ट योगमार्गसे साधना कर सकते हैं, जबकि घरपर रहकर हम मात्र भक्तियोग, ध्यानयोग एवं धर्मप्रसारकी सेवा या अन्य कोई एक विशेष सेवा कर सकते हैं; किन्तु आश्रममें शीघ्र आध्यात्मिक प्रगतिहेतु पोषक साधना मार्ग एवं सेवा दोनों ही बताई जाती है, जिससे आध्यात्मिक प्रगति शीघ्र होती है । सन्त या गुरु साधकके विशेष गुण, कौशल्य या प्रवृत्ति देख योग्य साधना पद्धति बताते हैं, इससे अध्यात्मसे शीघ्र प्रगति होती है; किन्तु इसके लिए आश्रममें वास करना पडता है । हमारे श्रीगुरुके आश्रममें भिन्न साधक, भिन्न योगमार्गसे प्रगति कर रहे हैं और हमने हमारे श्रीगुरुको साधकोंको उनकी प्रवृत्ति, कौशल्य एवं आध्यात्मिक स्तर अनुरूप मार्गदर्शन करते हुए प्रत्यक्षमें देखा है; इसलिए सनातन संस्थामें कोई नृत्य तो कोई कला तो कोई विधिके माध्यमसे अध्यात्ममें प्रगति कर रहे हैं । वस्तुतः प्रत्येक व्यक्ति भिन्न होता है; अतः उसकी साधना पद्धति विशिष्ट होगी ही, यह सनातन सिद्धान्त है और यह आश्रममें रहनेसे ही ज्ञात होता है ।



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