‘प्रीति’, इस गुणको आत्मसात करनेका एक उत्तम स्थल है आश्रम : किसी भी सन्तके आश्रममें सभी भेदभाव भूलकर प्रेमसे कुटुम्ब भावनासे रहते हैं, ऐसेमें प्रीति, जो साधनाका एक महत्त्वपूर्ण चरण है, वह गुण सहज साध्य हो जाता है एवं धीरे-धीरे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’की अर्थात सम्पूर्ण विश्व ही मेरा घर है, यह भावना आत्मसात होने लगती है । आप सोचें ! आज यदि यह गुण समाजके प्रत्येक व्यक्तिमें समाविष्ट हो जाए तो यह वसुन्धरा कितनी सुन्दर हो जाएगी !
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