साधनाके भिन्न दृष्टिकोण सीखनेहेतु आश्रम जीवन व्यतीत करना आवश्यक : आश्रममें रहनेसे सेवाके मध्य हमें साधनाके सूक्ष्म दृष्टिकोण सीखनेको मिलते हैं; अतः ऐसे दृष्टिकोणोंको यदि व्यावहारिक जीवनमें भी उतारा जाए तो व्यक्तिके भीतर दिव्यता शीघ्र निर्माण होने लगती है । उदाहरणके रूपमें कोई भी सेवा करते समय उसे परिपूर्ण एवं चूकविरहित कैसे करना चाहिए ?, यह सिखाया जाता है और यदि यह गुण व्यवहारमें ही पालन किया जाए तो उस व्यक्तिके कार्यकी परिणामकारकता या फलनिष्पत्तिमें अत्यधिक वृद्धि होगी, जिसकी सभी स्तुति करेंगे और वह व्यक्ति सफलताकी नूतन ऊंचाइयोंको प्राप्त कर सकेगा । अनेक गुरुभक्तोंको अपने सांसारिक यशका श्रेय, अपने गुरुको देते हुए आपने सुना ही होगा ।
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