सन्तोंके आश्रममें जाकर सेवा करनेका महत्त्व (भाग-१)


पुरुषार्थ करनेका स्थल है आश्रम : आश्रम शब्दकी व्युत्पत्ति आ+श्रम से हुई है; अतः आश्रम एक ऐसा स्थल है, जहां जाकर योग्य दिशामें श्रम या पुरुषार्थ करनेसे लौकिक एवं पारलौकिक कल्याण निश्चित ही होता है; इसलिए आश्रममें जानेसे श्रम करनेकी प्रवृत्ति निर्माण होती है । आजके वैज्ञानिक युगने मानवको सुखभोगी और आलसी बना दिया है, आश्रममें रहकर कुछ दिवस सेवा करनेसे आलस्यके संस्कार नष्ट होते हैं एवं तत्परता और कर्मठताके गुण आत्मसात होते हैं ।



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