आश्रम व्यवस्था (भाग – ३)


आश्रम व्यवस्थाका जहां शारीरिक और सामाजिक आधार है, वहीं उसका आध्यात्मिक अथवा दार्शनिक आधार भी है । भारतीय मनीषियोंने मानव जीवनको केवल प्रवाह न मानकर, उसका उद्देश्यके साथ निरूपणकर, उनके ध्येय तथा गंतव्यको निश्चित किया । जीवनको सार्थक बनानेके लिए चार पुरुषार्थों – धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षकी व्यवस्था की गई । प्रथम तीन पुरुषार्थ साधनरूपसे तथा अंतिम साध्यरूपसे व्यवस्थित था। मोक्ष परम पुरुषार्थ अर्थात जीवनका अंतिम लक्ष्य था, किंतु वह अकस्मात अथवा कल्पनामात्रसे नहीं प्राप्त हो सकता है । उसके लिए साधनाद्वारा क्रमश: जीवनका विकास और परिपक्वता आवश्यक है । इसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिए भारतीय द्रष्टाओंने आश्रम संस्थाकी व्यवस्था की । आश्रम वास्तवमें जीवका शिक्षणालय अथवा विद्यालय है, चाहे वह किसी भी अवस्थाका आश्रम हो । ब्रह्मचर्य आश्रममें धर्मका एकांत पालन होता है । ब्रह्मचारी पुष्टशरीर, बलिष्ठबुद्धि, शान्तमन, शील, श्रद्धा और विनयके साथ युगोंसे उपार्जित ज्ञान, शास्त्र, विद्या तथा अनुभवको प्राप्त करता है । सुविनीत और पवित्रात्मा ही मोक्षमार्गका पथिक हो सकता है । गृहस्थ आश्रममें धर्मके आधारपर अर्थका उपार्जन तथा कामका सेवन करनेका विधान है । संसारमें अर्थ तथा कामके अर्जन और उपभोगके अनुभवके पश्चात अधिकांश जीवोंमें त्याग और संन्यासकी भूमिका प्रस्तुत होती है, ऐसे जीवोंमें संयमपूर्वक ग्रहणके बिना त्यागका प्रश्न उठता ही नहीं । ऐसा करनेसे वानप्रस्थकी नींव सिद्ध होती है एवं संन्यासके सभी बंधनोंका त्यागकर पूर्णत: मोक्ष पथपर अग्रसर होने हेतु सिद्ध होता है । इस प्रकार आश्रम संस्थामें जीवनका पूर्ण उदार, किंतु संयमित नियोजन था ।

स्मृतियोंमें चारों आश्रमोंके कर्तव्योंका विस्तृत वर्णन मिलता है । मनुने मानव आयु सामान्यत: एक सौ वर्षकी मानकर उसको चार बराबर भागोंमें बांटा है। प्रथम चतुर्थांश ब्रह्मचर्य है। इस आश्रममें गुरुकुलमें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करना कर्तव्य है । इसका मुख्य उद्देश्य विद्याका उपार्जन एवं आगेके जीवन हेतु उपयोग तथ्य आत्मसात कराना था । मनुने ब्रह्मचारीके जीवन और उसके कर्तव्योंका वर्णन विस्तारके साथ किया है (अध्याय २, श्लोक ४१-२४४)। ब्रह्मचर्य उपनयन संस्कारके साथ प्रारंभ और समावर्तनके साथ समाप्त होता है ।



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