घर आए सभी अतिथियोंका प्रेमभाव से आतिथ्य करें


‘वसुधैव कुटुम्बकं’का प्रथम पाठ हमने अपने माता-पितासे सीखा
हमारे घर, माता-पिताके मिलनसार स्वाभावके कारण अतिथियोंका तांता लगा रहता था जैसे किसीको परीक्षा देनी हो, किसीको बस या ट्रेन लेनी हो, किसीको अपनी अपनी चाकरीके लिए उस नगरमें रहकर कुछ दिवस प्रयास करना हो, किसीको किसी चिकित्सकको दिखाना हो, किसीको अपनी पुत्र या पुत्रीके लिए वर या वधु ढूंढना हो ऐसे अनेक कारणोंसे हमारे गांव या आसपाससे हमारे सगे-सम्बन्धी, मित्र, परिजन, या परिचित या परिचितके परिचित आते रहते थे और हमारा घर, उनका रहने हेतु सबसे प्रिय स्थान होता था । जब भी कोई आता तो मेरे पिताजी उनका बडे प्रेमसे परिचय कराते हुए कहते, “ये मेरे भाई या काका (चाचा) हैं” । यह सुनते-सुनते मैं बडी हुई । जब मैं उनके ऐसे ‘७०-७५ भाईयों एवं काकाओं’से मिल चुकी और प्रत्येक माह या दो माह पश्चात एक नूतन व्यक्ति उनके भाई या काका बनकर घरमें प्रकट हो जाते थे और माता-पिता उनका आतिथ्य इतनी आत्मीयतासे करते जिससे वे हमारे कुटुम्बके सदस्य बन जाते और उनका आना-जाना आरम्भ हो जाता ! तो मैंने जिज्ञासावश एक दिवस अपने पिताजीसे सहज ही पूछा, “आपके कुल कितने भाई और काका हैं ?”
उन्होंने मुझे बडे प्रेमसे उत्तर देते हुए कहा, “वसुधैव कुटुम्बकं ! सम्पूर्ण विश्व ही मेरा घर है और इसके सभी सदस्य हमारे बन्धु-बान्धव हैं ।” मैंने उन्हें कभी भी ये मेरे दूरके चचेरे, मौसेरे, फुफेरे भाई हैं, ऐसा कहते नहीं सुना ! और वे दोनों कभी भी किसी अतिथिके सत्कारमें भेदभाव भी नहीं करते थे और तो और जो भिखारी घर एक बार भीख मांगने आता तो वह भी हमारे कुटम्बका सदस्य बन जाता ! मेरी माताजी भिखारियोंको भी बडे प्रेमसे भोजन करातीं या उन्हें अन्न, वस्त्र, धन जो भी उनके सामर्थ्य अनुसार होता, सब देतीं । एक दिवस ऐसे ही किसी भिखारीका आतिथ्य करते हुए मैंने उनसे कहा, “यह तो भिखारी हैं तो आप उनकी ऐसे आतिथ्य क्यों करती हैं जैसे वे हमारे सगे-सम्बन्धी हों ?” तो मेरे माताजीने मेरी शंकाका निराकरण करते हुए बहुत ही निश्छलतासे कहा, “बेटा, भविष्य किसने देखा है, क्या पता मेरे संचितमें क्या है और यदि मैं अगले किसी जन्ममें भिखारी बनूं और आज जो भिखारी है, वह धनवान हो और मैं उसके घर भीख मांगने जाऊं तो आज मैं जैसा उसे दूंगी, वह कल मुझे वैसा ही देगा; इसलिए दान सदैव सर्वश्रेष्ठ वस्तुओंका ही करना चाहिए ! जिसका उपयोग हम नहीं कर सकते हैं उसे दूसरोंको दानमें नहीं देना चाहिए !” मेरी माताजीने कर्मफलके सिद्धान्तकी सरलतासे व्याख्या कर इसे मेरे अन्तर्मनमें ऐसे अंकित कर दिया कि उसे मैं आज भी उसे भूल नहीं पाई हूं । वस्तुत: यदि आज मैं अध्यात्ममें हूं तो वह उनके पुण्य प्रतापका भी परिणाम है । वे आज इस संसारमें नहीं है और मेरे पिताजी कहते थे जब तुमसब इस संसारमें विचरण करोगे तो तुम्हें ज्ञात होगा, हमने आपको क्या दिया है और सचमें जब मैंने सर्वत्र धर्मप्रसारके मध्य भ्रमण किया तब अधिकतर स्वार्थी और तमोगुणी प्रवृत्तिके लोगोंसे मेरा सामना हुआ तो मेरा मन ईश्वरके प्रति कृतज्ञतासे भर उठता है कि उन्होंने भोगकी और नहीं अपितु योगकी और प्रवृत्त करनेवाले सात्त्विक प्रवृत्तिकी पालक हमें दिए । धर्म, अध्यात्म, त्याग और साधनाका प्रथम पाठ हमने हमारे माता-पितासे सीखा !



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