आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा भारतकी मूल पद्धतियां


अंग्रेजोंके आगमनसे पूर्व अर्थात आजसे दो सौ पूर्वतक प्रत्येक गांवके अनेक सदस्य आयुर्वेदिक जडी-बूटियोंके जानकार होते थे; अतः आजके कुकुरमुत्ते समान फैले हुए विदेशी चिकित्सालयोंकी उन्हें आवश्यकता नहीं होती थी । हमारी वैदिक संस्कृतिमें योगासन, प्राणायाम, योग्य आचार-विचार एवं ऋतु अनुसार सात्त्विक भोजन पद्धति इतनी वैज्ञानिक थी कि यदि कोई उसका पालन करे तो वह निश्चित ही शारीरिक एवं मानसिक दृष्टिसे स्वस्थ रहेगा । किन्तु स्वतन्त्रता पश्चात आयुर्वेद एवं अन्य प्राकृतिक चिकित्साके संवर्धन हेतु हिन्दू धर्मद्रोही राजनेताओंसे कुछ भी योग्य प्रयास नहीं हुए । किन्तु  आज लोग एलोपैथीकी औषधियोंके दुष्परिणामोंसे जैसे-जैसे परिचित होने लगे हैं, वैसे-वैसे वे स्वतः ही आयुर्वेद एवं अन्य वैकल्पिक प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियोंकी ओर प्रवृत्त हो रहे हैं ।



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