अप्रैल २५, २०१९
मुम्बईमें १९९३ के विस्फोटके मुख्य अभियुक्तोंमेंसे एक और भारतके सबसे बडे शत्रु दाऊद इब्राहीमके साथी अब्दुल गनी तुर्कके नागपुर कारावासमें मृत्युके समाचार आ रहे हैं । तुर्कपर १२ मार्च १९९३ के दिवस हुए इस आक्रमणमें ‘सेंचुरी बाजार’में ‘आरडीएक्स’ रखनेका दोषी पाया गया था । इस आक्रमणमें ११३ लोगोंकी मृत्यु और २२७ लोग चोटिल हुए थे । तुर्क इस प्रकरणमें दोषी पाए जानेवाला आठवां व्यक्ति था । टाइगर मेमन अभीतक भागा हुआ हैं, जबकि याकूब मेमनको वर्ष २०१५ में फांसी दे दी गई थी ।
स्वास्थ्य ठीक न होनेके चलते उसे चिकित्सालयमें प्रविष्ट करवाया गया था । तुर्कको टाडा न्यायालयने मृत्यु दण्ड दिया था; परन्तु उच्चतम न्यायालयने इसे आजीवन कारावासमें परिवर्तित कर दिया था । टैक्सी चालक अब्दुल गनी तुर्कको सेन्चुरी बाजारके मैनहोलके नीचे ‘आरडीएक्स’ लगानेका दोषी पाया गया था । इस मैनहोलके ऊपरसे एक बसके गुजरनेसे विस्फोट हुआ था, जिसमें ११३ लोग मारे गए थे और २२७ लोग चोटिल हुए थे ।
“ इतने लोगोंकी निर्मम हत्या करनेवाला दुर्दान्त आतंकी आजीवन कारावास भोगते हुए अपनी मृत्युको प्राप्त हुआ; परन्तु क्या न्यायालय और संविधान दुर्दान्त आतंकीको त्वरित मृत्युदण्ड न देकर मृतक परिवारों और देशके सैनिकों, जो इन्हीं आतंकियोंसे देशकी रक्षाके लिए प्राणोंकी आहुति देते हैं, उनसे न्याय कर पाएं ? सम्भवतः नहीं । जिसने निर्दोष लोगोंको जिहादके नामपर मारते हुए दया नहीं की, वह दयाका पात्र था क्या ? अभी ही कुछ दिवस पूर्व सऊदी अरबने आतंकमें सम्मिलित १०० से अधिक नागरिकोंके सिर काटनेका आदेश दिया तो भारत यह कब सीखेगा ? और यह कटु सत्य हमारी न्याय प्रणाली और इस तथाकथित लोकतन्त्रकी सत्यताको उजागर करता है और साथमें जिन परिवारोंपर कष्टोंका पहाड टूट पडता है, उन्हें मुंह चिढा रहा है । दण्डका कठोर विधान न होनेसे ही आज राष्ट्रकी यह दुर्दशा है; अतः यह परिवर्तित होनी चाहिए ! ?”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : सुदर्शन न्यूज
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