अच्छे पुरोहितोंके अभाव का कारण, वे जिस दक्षिणा व सम्मानके पात्र हैं, वह हिन्दू समाज नहीं देता !


कुछ समय पहले हम एक व्यक्तिके पुष्प (अस्थियां) लेकर प्रयागराज गए थे । हमारे साथ एक नगरके कुछ प्रतिष्ठित धनाढ्य भी गए थे । अस्थि विसर्जनसे पूर्व एक छोटीसी संक्षिप्त श्राद्धविधि की गई और उसके पश्चात पुरोहितने दान हेतु जो इच्छा है, वह अर्पण करने हेतु कहा । वहां उपस्थित सभी पुरुषोंको पुरोहितको दान देनेके विषयमें शान्त देखकर मैंने ५१००/- रुपये पुरोहितको दिए एवं संगममें अस्थि विसर्जन हेतु गए । विसर्जनके पश्चात हम जिनके साथ गए थे, वे कहने लगे, “आपने पण्डितको अधिक पैसे दे दिए । ग्यारह सौ रुपयेमें उसे निपटाया जा सकता था ।” मैंने उनसे कहा, “हम २५००० रुपये व्ययकर प्रयागराज आए हैं और जो पुरोहित आपके लिए उस मृत व्यक्तितक आपके भाव पहुंचाने हेतु सर्व पितृकर्म कर रहा है, उसे आप उसकी पात्रता अनुरूप दान क्यों नहीं देना चाहते हैं ? यदि ऐसी ही बात थी तो यहां इतने पैसे व्ययकर आनेकी आवश्यकता ही नहीं थी ! श्राद्धविधिमें जो दान पण्डितको दिया जाता है, उसका भाव आपके पितरोंतक पहुंचता है और वे आपको आशीर्वाद देते हैं; इसलिए उसमें कृपणता दिखाना, वह भी जब हमारे पास आर्थिक क्षमता हो, वह उस विधिके प्रति अश्रद्धा ही है ।
उन सब लोगोंने मेरी बातको मान्य किया तो मैंने कहा आज श्राद्धविधि करनेवाले पुरोहितोंका विशेषकर अच्छे पुरोहितोंका इसलिए भी अत्यधिक अभाव होता जा रहा है; क्योंकि वे जिस दक्षिणा व सम्मानके पात्र हैं, वह हिन्दू समाज नहीं देता है; इसलिए अब इस क्षेत्रमें अच्छे पुरोहित बहुत ही अल्प संख्यामें मिलते हैं । यदि यही स्थिति रही तो हमारी तीन-चार पीढियों उपरान्त, मृत्यु पश्चात कोई मन्त्रोच्चारकर अन्त्येष्टि करनेवाले नहीं मिलेंगे, इस बातका सभी हिन्दू ध्यान रखें ! आज अन्त्येष्टि एवं श्राद्ध इत्यादिके प्रति हिन्दुओंकी उदासीनताके कारण ही, मृत्योत्तर कर्मका इतना प्रगल्भ शास्त्र व विधान उपलब्ध होते हुए भी सभी हिन्दुओंके घरोंपर मध्यमसे तीव्र स्तरका कष्ट है !



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