चित्रपट जगतके कलाकारोंके आए दिन आत्महत्याके समाचार आ रहे हैं, जो निश्चित ही चिन्ताजनक हैं । सबसे अधिक दुःखकी बात यह है कि ये लोग आजकी नूतन पीढीके आदर्श बन चुके हैं; किन्तु क्या समस्याओंसे उद्विग्न होकर अपनी इहलीलाको समाप्त कर लेना बुद्धिमानी है ? क्या खरे अर्थोंमें ऐसे लोग समाजके आदर्श बनने चाहिए ? हमारे देशमें सहस्रों भक्त एवं सन्त हुए हैं, जिन्होंने कठिनसे कठिन परिस्थितिमें भी अपना धैर्य नहीं छोडा और ईश्वर या गुरुके प्रति अपनी अटूट निष्ठाके कारण सारे अवरोधोंको पारकर इतिहासमें एक आदरयुक्त स्थान बना गए । यदि बाल्यकालसे ही सभीको ऐसे चरित्रका पठन-पाठन, मनन एवं चिन्तन करने हेतु कहा गया होता तो क्या आजकी पीढी ऐसे नीतिशून्य, विवेकशून्य लोगोंको अपना आदर्श मानती !
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