अधिकार और उपदेश


“जैसे हो अधिकार वैसे करें उपदेश’’ इस कथन अनुसार सन्त मार्गदर्शन करते हैं । एक बार स्वामी रामकृष्ण परमहंसके पास एक भक्त आया । वह थोडा विचलित था ।  स्वामीजीने पूछा, “क्या हुआ ?”

भक्तने कहा, “चतुष्पथपर (चौराहेपर) एक व्यक्ति आपको अपशब्द बोल रहा है ।” स्वामीजीने कहा, “वह तुम्हारे गुरुको अपशब्द कह रहा था और तुम सुनकर आ गए, जाओ उसे रोको और वह शान्त न हो तो एक थप्पड लगाना ।”

अभी वह निकलकर गया ही था कि एक दूसरा भक्त आया । उसके सिरसे रक्त बह रहा था । स्वामीजीने पूछा, “क्या हुआ, यह रक्त कैसा ?”  दूसरे भक्तने कहा, “चौराहेपर एक व्यक्ति आपको अपशब्द कह रहा था, मुझसे सहन नहीं हुआ तो मैंने उसे मारा और इसी हाथापाईमें मुझे भी चोट लग गई ।”

स्वामीजीने प्रेमसे झिडकते हुए कहा, “कितनी बार कहा है तुम्हें कि सभीमें काली मां है, इस प्रकार किसीपर हाथ नहीं उठाते ।”

शिष्यने शीश झुकाकर स्वामीजीसे क्षमा मांगी । ऐसा स्वामीजीने क्यों किया ? पहले भक्तकी गुरुपर निष्ठा कम थी; अतः स्वामीजीने उसे प्रेरणा दी कि जो भी उसके गुरुका विरोध करे, उसका विरोध करो ! दूसरे भक्तकी साधनाका प्रवास सगुणसे निर्गुणकी ओर हो रहा था; अतः स्वामीजीने उसे सर्वत्र कालीके स्वरूपको देखने की सीख दी । क्या इतना सूक्ष्म अभ्यास करनेवाला अध्यात्मशास्त्र अन्य धर्मोमें है ?



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